घुमक्कड़ साथी (झारखण्ड-२)

 

रंगरेज के रंग ही हैं, जो बिखरे हैं धरा पर मोतियों से;

चुनना सब्र से अपने ख्वाबों के रंग….

 

रांची के अपने प्रवास के दौरान हमने शहर का कोना-कोना छान मारा। इतना जरूर कहना पड़ेगा कि अगर किसी को जीवन में खुशमिजाज लोगों की कमी है, तो उसे एक बार रांची आवश्य घूम लेना चाहिए। शायद उसकी यह कमी यहाँ जरूर पूरी हो जाए।

 

रांची की अपनी यात्रा पूरी कर हम धनबाद की ओर बढ़े। फिल्मों में देखे धनबाद के किस्सों ने हमें एक बार यहाँ घूमने को मजबूर कर दिया। धनबाद को भारत की कोयला राजधानी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर सेल, कोल इण्डिया, और टाटा समूह की कोयले की कई खदाने हैं। इन खदानों को देखने पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं। एक समय ऐसा था कि जब इन खदानों पर भू-माफियाओं का राज हुआ करता था और स्थिति थोड़ी खराब थी, जिसे बाद में सरकार ने अपने अधीन कर लिया।

 

तोपचांची लेक : तोपचांची लेक का निर्माण 1915 में शुरू हुआ था, जो 1924 में बनकर तैयार हुआ। लेक का मुख्य उद्देश्य धनबाद शहर और कोयले की खदानों को पानी पहुँचाना था। पारसनाथ शिखर की तलहटी में स्थित यह लेक धनबाद आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य आपके मन को भी मोह लेगा। तोपचांची लेक के भ्रमण के दौरान आप यहाँ स्थित पारसनाथ पहाड़ की कई चोटियों तक ट्रैकिंग भी कर सकते हैं और पूरे धनबाद शहर को ऊपर से देखने का लुत्फ़ उठा सकते हैं। तोपचांची में एक वन्यजीव अभ्यारण भी है, जो तोपचांची वन्यजीव अभ्यारण के नाम से जाना जाता हैं। तोपचांची लेक के अतरिक्त धनबाद में दो और डैम हैं मैथन डैम और पंचेत डैम।

 

पारसनाथ : पारसनाथ की पहाड़ियाँ या श्री सम्मेता जी, समुद्र के तल से 4480 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। ये गिरिडीह की पहाड़ी श्रृंखला है, जिसका सर्वोच्च शिखर 1350 मीटर ऊँचा है। यह केवल झारखंड की ही सबसे ऊँची चोटी नहीं है, बल्कि हिमालय के दक्षिणी हिस्से का सबसे उंचा पर्वत है। यह जैनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र तीर्थों में से एक है। माना जाता हैं कि यहाँ पर 24 जैन तीर्थंकरों में 20 को मोक्ष प्राप्त हुआ हैं। तेईसवें तीर्थंकर पारसनाथ थे, तो उनके नाम पर इस जगह का नाम “पारसनाथ” पड़ा। अगर आप दर्शन के उद्देश्य से ऊपर चढ़ाई कर रहे हैं, तो आपको रास्ते में पड़ने वाले अनेकों मंदिरों का भी ध्यान रखना चाहिए। माना जाता हैं कि इसमें कई मंदिर तो 2000 साल पुराने हैं। जैन धर्म शास्त्रों में लिखा है कि जो व्यक्ति सम्मेद शिखर आकर पूरे मन, भाव और निष्ठा से भक्ति करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है और इस संसार के सभी जन्म-कर्म के बंधनों से वह मुक्त रहता है।

 

यहाँ से हम कोडरमा जिसे झारखण्ड का प्रवेश द्वार माना जाता हैं और जो एक शहरी क्षेत्र हैं, के रास्ते होते हुए वापस लौट आए। हमारी झारखण्ड की इस छोटी सी यात्रा ने हमें जीवन के उन पहलुओं से अवगत कराया, जिसका हमें अनुमान भी नहीं था। पहाड़ों पर बसे आदिवासियों का जीवन कठिन जरूर है, पर जितना आनंद वो जीवन का उठाते हैं, उतना शायद ही हम नगरवासी कभी उठा पाएं। आदिवासियों के बीच झारखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र का अद्भुत सौंदर्य देखते ही बनता है और यहाँ बहने वाली नदियां मानो इस जीवन में कई और रंग भर देती हैं।

Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

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