घुमक्कड़ साथी (झारखण्ड- १)

Jharkhand Dance

चंद लम्हें जरा ठहर कर तो देखों,

यही वादियों में तो फुर्सत मिलेगी।

ओढ़ी है, तुमने जो बढ़कर, शहर की चकाचौंध रंगत

सच कहता हूं यही गुमनाम चेहरों में मिलकर मिटेगी…

घुमक्कड़ी आवारगी है, जिसमें घुमक्कड़ हर शख्स और गुलिस्तां में एक हमसफर ढूंढ रहा होता है, जिसके साथ बैठकर वो जीवन की अनकही कह सके। ये अनकही दिल के वीरान उस कोने की वही सुगबुगाहट है, जिसे शायद ही हम कभी किसी अपने से बयान कर पाते हैं। इस घुमक्कड़ ने इस बार अपना हमसफर कुछ मनमोहक वादियों और गुमनाम चेहरों के राज्य झारखंड को बनाया। सदियों से घने जंगलों और छोटा नागपुर के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरे राज्य झारखण्ड ने बहुत कम ही अपने बारे में लोगों को बताया है। अनजाने को जानने की इसी कशिश ने मेरा सफर आदिवासी बाहुल इलाका झारखण्ड तक तय किया।

 

सफर शुरू करने से पहले ही मैंने तय कर लिया था कि कम ही बोलूंगा और अपने नजरों के सामने से गुजरने वाले हर वाक्ये को जस का तस कागज पर उतार दूंगा कि पढ़ने वाले को मौलिकता मिलती रहे और साथ ही झारखण्ड को इस घुमक्कड़ की नजर से देखने का अनुभव भी प्राप्त हो जाए। गया के रास्ते बस के सफर में मेरा पहला परिचय झारखण्ड से चतरा के माध्यम से हुआ। ‘चतरा’ बिहार और झारखण्ड के बॉर्डर पर बसा पहला शहर है, जहाँ हमारी बस रात्रि के भोजन के लिए रुकी। मित्र ने ढाबे नुमा रेस्टोरेंट के मेनू के तीन पन्ने पलटे और उसे मेरी तरफ सरकाते हुए कहा ‘फ्राई दाल, पनीर की सब्जी और मक्खन लगी तवे रोटी के बारे में आपका क्या ख्याल है महाशय? बस से उतरते ही मैं उस रेस्टोरेंट की टाट से सजे रसोईघर का मुआयना कर आया था। सच कहता हूँ देसी चूल्हे के काले धुए से सजे उस रसोईघर को देखने के बाद मैं अपने स्वास्थ को लेकर थोड़ा शसंकित था कि यहाँ खाना खाया भी जा सकता है या नहीं! पर मित्र महाशय के आग्रह, सहयात्रियों की प्लेटों से आ रही खाने की खुशबू और बस चालक की हिदायत कि आगे बस कही नहीं रुकेगी ने मुझे खाने को मजबूर कर दिया।

 

मैंने अनमने ढंग से मेनू को एक बार पलटा और मित्र से कहा, बहुत दिन हो गए अण्डा-करी खाए तो क्यों न आज वो ही हो जाए। मित्र ने मुझे गौर से देखा; अपना ऑर्डर ठुकराए जाने से वो शायद कुछ नाराज थे उनके चेहरे के भावों को समझकर मैंने झट अपना पैतरा बदला और कहा मुझे खाने पे कुछ संदेह हैं और अंडा करी में नुक्सान दायक कुछ भी नहीं होगा। मित्र मेरी शंका पर थोड़ा मुस्कुराए और खाने का आर्डर देते हुए बोले ‘महाशय अभी आप को बहुत कुछ सीखना है।’ जीवन में खड़े मसालों और देसी रसोई में पके खाने का ऐसा स्वाद शायद ही मैंने कभी चखा था। आत्मा तक खाने के बाद तृप्त थी और मित्र महाशय मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

 

लावलोंग वन अभ्यारण और हजारीबाग राष्ट्रीय वन क्षेत्र के बीच से गुजरने वाले रास्ते पर भोजन उपरांत हमारी बस आगे बढ़ी। अँधेरा घना था और मन में एक अजीब सा उत्साह भी था कि बचपन से सुन रखी कहानियों के जंगली जानवर न जाने कब बस के सामने आ जाए और हमें उन्हें देखने का अवसर प्राप्त हो जाए।

 

हजारीबाग राष्ट्रीय वन अभ्यारण : लगभग 184 वर्ग किमी में फैले इस वन अभ्यारण की शोभा देखते ही बनती है। पूरा जंगल घने उष्ण कटिबंधीय वनों से आच्छादित है, जिनमें कई प्रकार के जंगली जीव पाए जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से भालू, सांभर, नीलगाय, चीतल और काकर पाए जाते हैं। इसके अतरिक्त यह हाथी, बाघ, तेंदुआ, हिरन और अन्य कई प्रजातियों का घर है। ऊँची-ऊँची पहाड़ी चोटिया, घने वन, वन्य जीव के साथ-साथ यह क्षेत्र अपनी कई झीलों, मंदिरों, प्राकृतिक सौंदर्य और यहाँ पाए जाने वाले जनजातीय लोगों के लिए भी प्रसिद्ध है। क्षेत्र के अवलोकन के लिए यहाँ कई वाच टावर बनाए गए हैं, जहाँ से सैलानी इसकी शोभा का आनंद ले सकते हैं।

 

अगली सुबह की पहली किरण के साथ हम रामगढ़ पहुंचे। अपनी ऐतिहासिकता और ओद्योगिक सामग्रियों के पाए जाने के कारण रामगढ़ काफी विख्यात हैं। यह जिला 12 सितम्‍बर, 2007 में स्‍थापित किया गया था, जो हजारीबाग जिले से अलग करके बनाया गया था। रामगढ़ का शाब्दिक अर्थ है – भगवान राम का गढ़। यहाँ का सबसे प्रचलित स्थल ‘टूटी झरने’ के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान् शिव का एक प्रसिद्ध मंदिर है, जिसके शिवलिंग का जलाभिषेक स्वयं माँ गंगा करती हैं। 1925 में रेलवे लाइन बिछाने के दौरान यह मंदिर प्राप्त हुआ, जिसमें एक शिवलिंग और उसके ऊपर बनी माँ गंगा की मूर्ति प्राप्त हुई। चमत्कार तो यह था कि मूर्ति के कलश से अनवरत जल शिवलिंग पर गिर रहा था। मान्यता हैं कि यहाँ मांगी हर मुराद पूरी होती हैं।

 

रामगढ़ से हम रांची के लिए बढ़े। रांची झारखण्ड राज्य की राजधानी हैं और जमशेदपुर के बाद यहाँ का सबसे बड़ा शहर हैं। रांची को ‘झरनों के शहर’ के रूप में जाना जाता हैं।

 

हंड्रू फॉल्स : रांची से 45 किमी दूर स्थित, यह शानदार झरना एक पसंदीदा पर्यटन स्थल है। सुवर्णरेखा नदी 320 फीट ऊंचाई से नीचे गिरती है, जिससे हंड्रू फॉल्स बनता है। झरने के तली तक पहुंचने के लिए आपको 750 सीढ़ियों से नीचे जाने की जरूरत है और आप इसके हर दूसरे भाग पर एक अलग ही अनुभव करेंगे!

 

बिरसा जूलॉजिकल पार्क : ये देश में खूबसूरत चिड़ियाघरों में सबसे अच्छा माना जाता है। बिरसा जूलॉजिकल पार्क आपके द्वारा खर्च किए जाने वाले हर सेकेंड में आपको एक विशेष अनुभव कराएगा। यह 104 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र में फैला हुआ है, जो जंगली जानवरों के लिए एक असली घर है। आप यहाँ जल निकायों के साथ प्राकृतिक वनों का अहसास भी महसूस कर सकते हैं। यह शहर के केंद्र से सिर्फ 16 किमी दूर है। बिरसा जूलॉजिकल पार्क को राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा दो भागो में बांटा गया है। बड़ा क्षेत्र जंगली जानवरों का घर है और छोटा क्षेत्र पूरी तरह से एक वनस्पति खंड है। चिड़ियाघर में पाए गए कुछ जानवरों में शेर, बाघ, हिरन, लोमड़ी, जंगली बिल्लियों, भौंकने वाले हिरण और हाथी शामिल हैं।

 

रॉक गार्डन : रांची में रॉक गार्डन को जयपुर गार्डन का दूसरा भाग माना जाता है। यहाँ गोंडा हिल्स के चट्टानों को इस खूबसूरत बगीचे और अंदर की मूर्तियों को बनाने के लिए नक्काशीदार बनाया गया था। यहाँ बने कोंडे बांध, जो गोंडा हिल्स के तल पर स्थित है, देखने में अधिक आकर्षक लगते है।

 

दासम फॉल्स : रांची से 34 किमी दूर स्थित, दासम फॉल्स एक सुंदर गंतव्य है, जो पर्यटकों को प्रसन्न करता है। 144 फीट की ऊंचाई से गिरने वाला ये झरना वास्तव में मनमोहक है। बच्चों के यहाँ स्नान करने पर सख्त प्रतिबंध लगाया गया है। आप बारिश के मौसम में इस जगह का अद्भुत नजारा अगर एक बार देख ले तो आपके मन में ये एक कभी न भूलने वाली यादो के रूप में समा जाएगा!

 

जोन्हा फॉल्स : शहर से करीब 40 किमी दूर स्थित, जोन्हा फॉल्स रांची में एक और लुभावनी फॉल्स है। झरने तक पहुँचने के लिए 700 कदमों पर चढ़ना एक दिलचस्प रोमांच होगा। घने जंगल से घिरा हुआ ये नजारा वाकई अद्भुत हैं।

 

जगन्नाथ मंदिर : पहाड़ की चोटी पर स्थित 17 वीं शताब्दी के शहर से मौजूद एक प्रमुख आकर्षण है। जो की पुरी में मौजूद जगन्नाथ मंदिर की तरह दिखता है और इसे पुरी मंदिर के बाद दूसरा सबसे बड़ा जगन्नाथ मंदिर माना जाता है। आप यहां से शहर का उत्कृष्ट नज़ारा देख सकते हैं।

 

इसके अतरिक्त भी रांची में घूमने को और भी बहुत कुछ हैं। झारखण्ड की इस यात्रा ने सही मायने में हमें अपने अतीत से जुड़ने का वो अवसर दिया, जो अविस्मरणीय है।

क्रमशः ——

Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

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