दुविधा में दोनों गए, माया मिली न…

राजनीति बेहद दिलचस्प खेल है, जहां हालात के मुताबिक दोस्त-दुश्मन बदलते रहते हैं। तभी, मंच पर दो धुर विरोधी फिर एकसाथ हैं और सिर्फ साथ ही नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति आभार भी व्यक्त किया जा रहा है।
अब गुजरे जमाने की चर्चा करें तो, बसपा को चुनावी गठबंधन रास नहीं आता है, क्यों? इसका उत्तर काशीराम ने अपने एक बयान में समाहित करने का प्रयास किया। बात, 1996 की है, जब कांग्रेस-बसपा मिलकर चुनावी मैदान में उतरे थे। बसपा ने 315 और कांग्रेस ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन दोनों दल मिलकर 100 सीट भी नहीं जीत सके। इस परिणाम के बाद कांशीराम ने कहा था, “आज के बाद हम किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। हमारे वोट तो दूसरी पार्टी को ‘ट्रांसफर’ हो जाते हैं, लेकिन दूसरी पार्टी के वोट हमें कभी ‘ट्रांसफर’ नहीं होते।” खैर, यह तब की बात थी, वर्तमान सियासी हालात में मायावती को सपा के सहारे चुनावी रण फतह करना आसान दिख रहा है। वैसे भी, 2014 के लोकसभा चुनाव में ‛मोदी लहर’ ने उत्तर प्रदेश में बसपा को शून्य कर दिया। तो,2017 के विधानसभा चुनाव ने उनके ‘कमबैक’ की उम्मीदों को धूमिल कर दिया। फलस्वरूप, धुर विरोधी माया-मुलायम न सिर्फ मंच साझा कर रहे हैँ, बल्कि पुरानी चोट पर मरहम भी लगा रहे हैं। मायावती 2 जून, 1995 में
मुलायम समर्थकों द्वारा गेस्ट हाउस में किए गए अपने अपमान को भी भूलने को तैयार हैं, जिसका जिक्र उन्होंने स्वयं किया।
गौर करने लायक यह भी है कि मायावती के मिजाज को लेकर भविष्यवाणी करना बहुत कठिन है। चाहे बात 17 अप्रैल 1999 की हो, जब अटल बिहारी वाजपेयी को लोकसभा में अपनी पार्टी द्वारा मतदान नहीं किए जाने का भरोसा देकर मायावती अचानक सदन में आरिफ मोहम्मद खां और अकबर अहमद डंपी की तरफ देख कर गरजीं, ‘लाल बटन दबाओ।’ और वाजपेयी सरकार ने विश्वास मत खो दिया। ये उस जमाने की सबसे बड़ी ‘राजनीतिक कलाबाजी’ थी। इसके अलावा 1993 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराने के लिए कांशीराम और मुलायम सिंह यादव में गठजोड़ किया एवं सरकार भी बनाई, लेकिन साथ बहुत दिनों तक नहीं निभा। फिर, मायवती मुलायम सिंह का साथ छोड़कर बीजेपी के सहयोग से पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन कुछ ही महीनों में बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया। कुछ सालों बाद मायावती और बीजेपी ने दोबारा हाथ मिलाया, लेकिन ये प्रयोग भी अधिक दिनों तक नहीं चल पाया।
कुल मिलाकर, सपा-बसपा के मंच साझा करने का परिणाम कितना सुखद रहेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के पुराने मिजाज और जातिगत समीकरण को देखते हुए यह तय है कि सपा-बसपा मिलन ने यहां बीजेपी की राह मुश्किल कर दी है और प्रदेश की करीब-करीब हर सीट पर बीजेपी को जीतने के लिए लोहे के चने चबाने होंगे।

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Post Author: Soni

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