दिहबे अरघिया घाट हम जाइके…

भारतीय संस्कृति अपनी विविधता और सप्तरंगों के कारण प्राचीन काल से ही विश्व को आकर्षित करती रही है। आज भी इसने अपनी परम्पराओं को जीवित रखा है, जिनमें त्योहारों का विशेष महत्व है। ऐसा ही एक मनमोहक व्रत-त्योहार है छठ। जिसमें प्रकृति में सत्य के प्रतीक सूर्य की पूजा का विधान है।
यह पर्व भारतीय कैलेंडर के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी अर्थात दीपावली से ठीक छठे दिन मनाया जाता है। छठ पर्व भगवान् भास्कर को समर्पित है, जिसमें व्रती स्वच्छता के कठिन नियमों का पालन करता हुआ सूर्य की उपासना करता है। सूर्य को समर्पित होने के कारण इसे सूर्य षष्ठी के रूप में भी माना जाता है। समान्यतः छठ पूजा का व्रत घर की महिलाएं ही करती हैं, पर यदा-कदा पुरुष व्रती भी मिल जाते हैं।

ऐतिहासिक परिचय
छठ पूजा का इतिहास बहुत पुराना है, माना जाता है कि वैदिक युग से ही इसका प्रचलन भारत में रहा है। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में भगवान् सूर्य को समर्पित श्लोक लिखे गए हैं और इसी सूर्य उपासना का एक रूप छठ पूजा है। माना जाता हैं कि महाभारत काल में द्रौपदी ने यह पूजा पाण्डवों के कुशल क्षेम के लिए की थी, जिससे उनके जीवन की कठिनाइयां कम हो और उन्हें अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त हो सके। महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण को भी छठ पूजा करने का श्रेय दिया जाता है, जिसके बल और पौरुष ने युद्ध में पाण्डवों को शंकित कर दिया था। अनेक मान्यताओं में छठ पूजा का सबसे सही उल्लेख वैदिक युग के ऋग्वेद में किया गया है, जहाँ ऋषि-महात्मा अपने शरीर को भोजन से दूर रख कर निर्बाध रूप में सूर्य का प्रकाश ग्रहण करते थे।
अनुष्ठान पद्धति
वैसे तो दीपावली के त्यौहार के ठीक बाद ही छठ पूजा का आरम्भ हो जाता है। व्रती घर की साफ-सफाई में लग जाता है और घर को सभी रीतियों से पवित्र करते हुए व्रती सूर्य को अर्पित करने वाले भोग के निर्माण में लग जाता हैं, पर मुख्यतः यह पर्व चार दिनों का होता हैं।

१- नहाई-खाई
छठ के पहले दिन व्रती व्रत को ग्रहण करते हुए अपने घर को पूर्ण रूप में पवित्र करते हैं। इसके लिए व्रत का संकल्प लेते हुए सुबह नदी में स्नान करने से शुरुआत होती है और दिन भर में केवल एक बार ही भोजन ग्रहण किया जाता है। भोजन में भी विशेषता है कि चावल, चना दाल और लौकी बनाया जाता है। व्रती सिर्फ एक बार आहार ग्रहण करते हुए पर्व के प्रथम दिन का उपवास पूर्ण करता है। इस दिन चावल और लौकी का विशेष महत्व है, इसलिए इसे लौकी-भात भी कहते हैं।
२-खरना
छठ के दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रखता है और शाम को सूरज ढलने के बाद एक बार भोजन ग्रहण करता हैं। इस दिन खीर का विशेष महत्व होता है। व्रती शाम को भूमि पूजन करने के बाद रसाइओ खीर, सोहरी और केले का भोग भगवान् को अर्पित करता हैं और पूरा परिवार प्रसाद को ग्रहण करता है। इसी दिन से व्रती छठ के लिए 36 घण्टे के उपवास में प्रवेश करता है, जो बिना जल ग्रहण किए किया जाता है।
३-छठ संध्या अरग
यह छठ का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। शाम को इसमें व्रती अपने परिवार, सगे-संबंधियों, और पड़ोसियों के साथ एक गुट में गाते-बजाते निकट की नदी या तालाब में जाकर घुटने तक पानी में प्रवेश किए हुए डूबते सूर्य को अरग देता है। अरग और सूप इसके अभिन्न अंग हैं। व्रती उपवास के साथ सुबह से ही अरग में दिए जाने वाले भोग को तैयार करता है। खजुरी इसका मुख्य अंग है, जिसे इस विशेष अवसर पर तैयार किया जाता है। इसमें सूर्य को अरग में फल, फूल, अंकुरित अनाज, नारियल, मिठाई, गन्ना, खजुरी और सूप अर्पित किया जाता हैं। इस दिन रात के पूजा का विशेष महत्व होता है, जिसमें जलते दीपक को पांच गन्नों के बीच रख कर पूजा की जाती है। यह पांच गन्ने पंचतत्व को प्रदर्शित करते हैं। यह पूजा मुख्यतः उन घरों में बड़े धूम-धाम से होती हैं, जिसमें निकट ही कोई शादी या बच्चे का जन्म होता है।
४- छठ सूर्योदय/पारण/बिहनिया अरग
यह छठ पूजा का अंतिम दिन होता है, जिसमें व्रती अपने सगे-संबंधियों के साथ सूर्य उदय से पूर्व ही नदी के पास पहुंच जाते हैं और छठ संध्या की रीती दोहराते हुए उगते सूर्य को अरग देते हैं। इसके साथ ही पर्व पूर्ण हो जाता हैं जान-पहचान वालों में प्रसाद वितरित किया जाता है और सामाजिक शिष्टाचार में मिलने-मिलाने की प्रथा पूर्ण की जाती है।

मूल रूप से यह पर्व बिहार, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में मनाया जाता हैं। छोटे रूप में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के कुछ भागों में भी छठ का आयोजन होता है। वर्तमान में छठ पर्व लगभग सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। साथ ही साथ अब इसे विदेशों में भी आंशिक रूप में मनाया जाने लगा हैं। छठ सामूहिक रूप में साथ रहने और जीवन प्रदान करने वाले सूर्य के प्रति अपने श्रद्धा प्रकट करने का त्यौहार है, जिसे भारत की प्रकृति पूजा का एक उदाहरण माना जाना चाहिए।
सिद्धार्थ सिंह

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Post Author: kashipatrika

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