धान के खेतों में मुस्कुराती बरसात

शहरों में धूल तो खूब देखी होगी, वो भी जब इंडिया रोज बन रहा है। बड़े शहर तो इस धूल को शान की बात समझते हैं। चमचमाती कार के शीशों से सड़क से गुजरते कुछ गिनती के बचे गरीबों को इसमें सने देखना एक अलग ही अनुभव है, इस नए इंडिया में। ये गरीब अलग नहीं हैं हम-आप जैसे लोग ही हैं, जिन्होंने शहरी जीवनयापन को अपना पेशा बनाया है। घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर, जीवन की छोटी-छोटी खुशियों के सपने देखते और मजबूत चट्टान सा दुश्वारियों को झेलते हुए से। इनके लिए क्या गर्मी, जाड़ा और क्या बरसात !
धूल को नजदीक से देखना या जीना हो, तो कभी भारत के गावों की ओर देखिए। तप्त धरा से जब लपलपाती आग की तरह गर्म हवाए धूल के अम्बार को लेकर आगे बढ़ती हैं, तो सच मानिए केवल किसान ही उनमें सृजन के बीज देख सकता है। खड़ी धूप, धूल और अनगिनत सपने मिलकर उसके चेहरे को हल्का काला रंग दे देती हैं, जिस पर पड़ी रेखाएं सुर्ख हो जाती हैं, जो आधुनिक क्रीम से सने चेहरों के सामने कत्तई सुन्दर नहीं दिखेंगे। किसी कवि ने लिखा होता तो बेशक जानिए वो लिखता ये श्रम का रंग है।
पहली बरसात के बाद जब हम बजबजाते नालों, वॉटर लॉगिंग और सीवर ओवरफ्लो जैसे कठिन शब्दों से जूझ रहे होते हैं, तब तक अन्नदाता खेतों की मेड़, जोताई और पानी के बहाव के लिए स्वयं ही नालियों का निर्माण कर चुका होता है। ‘इंतजार’ इसके जीवन का एक अद्भुत शब्द है, जिसे ये चाह कर भी नहीं छोड़ सकता। इसकी कहानी इसी एक शब्द के इर्द-गिर्द गुथी होती है।
बरसात अच्छी हुई नहीं कि छींटे बीजों से निकले धान के नन्हे-नन्हे पौधों को ये कीचड़ और पानी से लबालब खेतों में रोपना शुरू कर देता है। उत्सव सा माहौल होता है, पूरा परिवार मिलकर यानी बच्चे से बूढ़े तक अन्न सृजन में जुट जाते हैं। मजाल है प्रकृति प्रदत एक भी पौधा इस जल और कीचड़ से बने तालाब में इधर से उधर हो जाए।
सच मानिए, क्षितिज तक फैली इस हरी धरा में जब मेघ बरसते हैं, तो धान के खेतों में हर पौधे को सहलाती बूंदे किसान के चेहरे की कालिमा को सुनहला कर जाती हैं।
सिद्धार्थ सिंह

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Post Author: Soni

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