आरजू है वफा करे कोई

आरजू है वफा करे कोई,
जी न चाहे तो क्या करे कोई।

गर मर्ज हो दवा करे कोई,
मरने वाले का क्या करे कोई।

कोसते हैं जले हुए क्या क्या,
अपने हक में दुआ करे कोई।

उन से सब अपनी अपनी कहते हैं,
मेरा मतलब अदा करे कोई।

तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर,
तुम से फिर बात क्या करे कोई।

जिस में लाखों बरस की हूरें हों,
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई।
■ दाग देहलवी

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *