दिन, महीने, साल.. गुजरते जाएंगे..

वक्त की घड़ियां कभी थमतीं नहीं ये अलग बात है धड़कन थम जाए जी हां, 31 दिसंबर की रात ठीक 12 बजे जैसे ही घड़ी की दो सूइयों का संगम हुआ, प्रहर के पहरे ने कलेंडर बदल लिया। धड़कनों की रफ्तार ने भी जिंदगी से एक धड़कन कम कर अगले वर्ष में छलांग लगा दी। […]

बेबाक हस्तक्षेप

जौन एलिया ने बात बड़ी दुरुस्त कही है, “जिंदगी का था अपना ऐश मगर सब की सब इम्तिहान में गुजरी।”सच ही है, बच्चों की जिंदगी स्कूली प्रश्न पत्रों में उलझ कर रह गई और आम आदमी की जिंदगी की जरूरतों में। लेकिन “खास” जो चुनावी मौसम में सियासतदारों को कहा जा सकता है, उन्हें भी […]

बेबाक हस्तक्षेप

“बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए, इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए।”कैफी आजमी की लिखी ये पंक्तियां देश के वर्तमान हालात पर बहुत सटीक बैठती हैं। किसी पार्क में नमाज पढ़ने को लेकर उठाया गया कानूनी कदम राष्ट्रीय स्तर की खबर ही नहीं बना, बल्कि खबरिया चैनलों के माध्यम से हमारे […]

चुनावी चाय, बनारसी चर्चा

तमाम राजनीतिक उपद्रव के बाद आखिर पांच राज्यों की जनता ने नए जनार्दन तय कर दिए और भविष्य की आशंका, अनुमान को भी हवा दे दी। सत्ता की जुगाली करने का आदी अपना बनारस भी इससे कहां अछूता है, इलेक्शन चाहे कहीं हो चर्चा तो बनारसियों की जागीर है। इसी उम्मीद से यह अनपढ़ भी […]

बेबाक हस्तक्षेप

“आदतन तुम ने कर दिए वादे,आदतन हम ने ए’तिबार किया।”गुलजार साहब की यह बात सियासतदार-जनता के बीच के रिश्ते पर सही बैठती है। वो आदतन चुनावी वादें कर जाते हैं और वोटर आदतन यकीन कर लेता है। लेकिन हवाई वादों की उम्र भी तय होती है। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भी इसी का नतीजा […]

नहि कोउ अस जनमा जग माहीं…

चुनाव चाहे विधानसभा का हो, लोकसभा का या वार्ड जैसी छोटी इकाई का। बहुत सिरदर्द का काम है, खासकर खासमखास यानी वीवीआईपी-दुर्लभ जीवों के लिए। जिन्होंने पांच साल अपनी सुख-सुविधाओं की बढ़ोतरी पर ध्यान लगाया, चमचों के उत्थान पर गौर किया और सिर्फ सुखद स्वप्न लोक का विचरन किया, उन्हें अचानक पहाड़ खोद चुहिया निकालने […]

बेबाक हस्तक्षेप

“यदि तोर डाक शुने केऊ न आसेतबे एकला चलो रे।एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!”रविन्द्रनाथ टैगोर ने ये पंक्तियां भले ही सकारात्मक भाव से लिखी हो, लेकिन देश के वर्तमान सियासी हालात इशारा करते हैं कि सियासी अकड़ ने अपने सामने सबको नतमस्तक करते हुए ‛अकेले’ चलने की ठान ली है। धर्म से लेकर […]

बेबाक हस्तक्षेप

तारीखें बदलती हैं, किंतु कुछ वाक्ये वक्त की तख्ती पर अटक कर रह जाते हैं, जिनसे सदियों तक पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। बोफोर्स, गोधरा, राम मंदिर… ऐसी कितनी ही तारीखें हैं, जो अब भी जस की तस बनी हुई हैं। ऐसी ही एक तारीख 8 नवंबर है।“नोटबंदी” की घोषणा की साथ अहम बनी […]

बेबाक हस्तक्षेप

मैथिलीशरण गुप्त ने बड़ी सुंदर कविता लिखी है, जिसकी कुछ पंक्तियां हैं- “हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी।” इन दिनों राजनीतिक बयानबाजी से पटे अखबारों को सहेजते हुए सहसा ये पंक्तियां मन में कौंध गई और सोच की उड़ान कुछ पल उन […]

बेबाक हस्तक्षेप

26/11 मुंबई में दहशत के दस साल शुरुआत आदम गोवंडी की पंक्तियों से “पार कर पाएगी ये कहना मुकम्मल भूल है, इस अहद की सभ्यता नफरत के रेगिस्तान को।” मुंबई की सड़कों पर दहशत के आज दस साल गुजर गए, पर लगता है कल की ही बात हो। पल-पल मृतकों की बढ़ती संख्या, नए जगह […]