काशी सत्संग : कड़वा सच

एक फकीर कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक सौदागर मिला, जो पांच गधों पर बड़ी-बड़ी गठरियां लादे हुए जा रहा था। गठरियां बहुत भारी थीं, जिसे गधे बड़ी मुश्किल से ढो पा रहे थे। फकीर ने सौदागर से प्रश्न किया, ‘इन गठरियों में तुमने ऐसी कौन-सी चीजें रखी हैं, जिन्हें ये बेचारे गधे […]

काशी सत्संग : पर उपदेश…

एक पंडितजी महाराज क्रोध न करने पर उपदेश दे रहे थे। वे कह रहे थे, ‛क्रोध आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन है। क्रोध से आदमी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वह पशु बन जाता है…’ लोग बड़ी श्रद्धा से उनका उपदेश सुन रहे थे। पंडितजी ने आगे कहा,‘क्रोध चाण्डाल होता है। उससे हमेशा बचकर […]

काशी सत्संग : महान कौन!

एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा, “पिताजी, आखिर महान शब्द का मतलब क्या होता है? महान लोग कौन होते है और वे महान कैसे बनते हैं?”पिता ने कहा- “ठीक है।”पिता ने बेटे को महान शब्द का अर्थ समझाने की एक तरकीब सोची। उन्होंने बेटे से कहा- “चलो दो पौधे लेकर आते है। एक को […]

काशी सत्संग : “मैं ही गरीब क्यों!”

बहुत समय पहले की बात है, भगवान बुद्ध एक गांव में धर्म उपदेश देने के लिए पहुंचे। गांव के लोग अपनी-अपनी समस्या लेकर उनके पास जाते और उनसे समाधान प्राप्त कर नई ऊर्जा के साथ वापस लौटते।गांव के बाहर एक गरीब राह में बैठा, बुद्ध के पास आते-जाते लोगों को निहारता रहता, उसने क्या देखा? […]

काशी सत्संग : गंदे कपड़े

शादी के बाद नविवाहित जोड़ा किराए के एक घर में रहने लगा। एक सुबह पत्नी खिड़की से बाहर देख रही थी। उसने पति को बुलाया और कहा कि सामने वाली छत पर देखो, कितने गंदे कपड़े सूख रहे हैं। लगता है इन लोगों को कपड़े धोना नहीं आता। पति कुछ नहीं बोला और अपने काम […]

काशी सत्संग : सलाह नहीं, साथ चाहिए

एक बार एक पक्षी समुंदर में से चोंच से पानी बाहर निकाल रहा था। उसे ऐसा करते देखकर दूसरे ने पूछा, ‘भाई, तुम ये क्या कर रहे हो।’पहले पक्षी ने उत्तर दिया, ‘इस समुंदर ने मेरे बच्चे डुबो दिए हैं, अब मैं इसे सूखा दूंगा।’ दूसरा पक्षी बोला, ‘भाई, तुझसे क्या समुंदर सूखेगा! तू तो […]

काशी सत्संग : गुरु क्यों!

एक पंडित रोज रानी के पास कथा कहने जाता था। कथा के अंत में सबको कहता, ‘राम कहे तो बंधन टूटे’। तभी पिंजरे में बंद तोता बोलता, ‘यूं मत कहो रे पंडित झूठे’। पंडित को क्रोध आता कि ये सब क्या सोचेंगे, रानी क्या सोचेगी।! पंडित अपने गुरु के पास गया, गुरु को सब हाल […]

काशी सत्संग : अज्ञानी अहंकार

एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी संत के साथ बैठे हुए थे। ठंड का दिन था। शाम हो गई थी। तब संत ने ठंड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां एकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों संत धर्म और आध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे। इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे […]

काशी सत्संग : धैर्य की परीक्षा

संत एकनाथ ने अपने एक योग्य शिष्य को दायित्व सौंपना चाहते थे। उन्होने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही। एक दिन उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया ओर एक दीवार बनाने का निर्देश दिया। शिष्य इस काम में जुट गए। दीवार बन कर तैयार भी हो गई, लेकिन तभी एकनाथ ने उसे तोड़ने का आदेश दे दिया। […]

काशी सत्संग : कौन गुणी… रात या दिन!

बहुत समय पहले की बात है, जब सृष्टि की शुरुआत ही हुई थी। दिन और रात दोनों में खूब दोस्ती थी, पर दोनों का स्वभाव बिल्कुल ही अलग-अलग था। रात सौंदर्य-प्रिय और आराम-पसंद थी, तो दिन कर्मठ और व्यावहारिक। रात सजना-संवरना पसंद करती थी, कभी तारों से भरे आसमान में चांद-सी पूरी खिल जाती, तो […]