काशी सत्संग : सूर्य तक का सफर

पुराने समय की बात है। एक राजा ने सूर्यग्रहण के संदर्भ में राजपंडितों से पूछा, ‘‘सूर्यग्रहण क्यों होता है?’’ पंडित बोले,‘‘राहू के सूर्य को ग्रसने से।’’ ‘‘राहू क्यों और कैसे ग्रसता है? बाद में सूर्य कैसे छूटता है?’’ जब उसे इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले, तो उसने आदेश दिया, ‘‘हम खुद सूर्य तक […]

काशी सत्संग : भक्ति का मोल

अयोध्या नगरी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे। संत को रामायण का श्रवण करने का व्यसन था । जहां भी कथा चलती वहां बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते। एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं मिला। वहीं पास से एक […]

काशी सत्संग : दुख का साथी

देवराज इन्द्र और धर्मात्मा तोते की यह कथा महाभारत से ली गई है। एक बार एक शिकारी ने एक हिरण पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था, पर निशाना चूक जाने से तीर हिरण की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा। पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर […]

काशी सत्संग : स्वयं में बदलाव

एक राजा था। वह अपनी बेटी से बहुत प्यार करता था, उसकी हर इच्छा पूरी करता था। लेकिन बेटी को कभी महल के बाहर नहीं जाने देता था। बेटी महल के बाहर की दुनिया से अपरिचित थी। एक दिन बेटी ने शहर देखने की इच्छा जताई। राजा के मना करने पर बेटी रूठ गई। राजा […]

काशी सत्संग : सत्कार और तिरस्कार

एक शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद थक कर किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिए बैठ गया। अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उसने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया, सामने रखा और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए जैसे ही पहली चोट की, […]

काशी सत्संग : पुरानी नाक

एक बार एक गरीब आदमी की भक्ति से संतुष्ट होकर ईश्वर ने उसे तीन पासा दिया और बोले- तुम जिन किन्हीं तीन कामनाओं से पासा तीन बार फेंकोगे, वे तीनों पूरी हो जाएंगी। वह आनंदोल्लासित हो घर जाकर अपनी स्त्री के साथ परामर्श करने लगा कि क्या वर मांगना चाहिए। स्त्री ने धन-दौलत मांगने की […]

काशी सत्संग: हवा में गुब्बारा

एक आदमी गुब्बारे बेच कर जीवन-यापन करता था। यह गांव के आस-पास लगने वाली हाटों में जाता और गुब्बारे बेचता। बच्चों को लुभाने के लिए वह तरह-तरह के गुब्बारे रखता। लाल, पीले, हरे, नीले और जब कभी उसे लगता की बिक्री कम हो रही है वह झट से एक गुब्बारा हवा में छोड़ देता, जिसे […]

काशी सत्संग : अपना अपना स्वभाव

एक बार एक भला आदमी नदी किनारे बैठा था। तभी उसने देखा एक बिच्छू पानी में गिर गया है। भले आदमी ने जल्दी से बिच्छू को हाथ में उठा लिया। बिच्छू ने उस भले आदमी को डंक मार दिया। बेचारे भले आदमी का हाथ कांपा और बिच्छू फिर से पानी में गिर गया। भले आदमी […]

काशी सत्संग: सच्चा सत्कर्म

एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूर्य यज्ञ किया, तो उनके मन में अभिमान आ गया कि मैंने दान-पुण्य करते हुए जैसा यज्ञ किया है, ऐसा अन्य किसी ने नहीं किया होगा। युधिष्ठिर का अभिमान देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने सोचा कि इस तरह अभिमान करने से तो किया गया पुण्य नष्ट हो जाएगा, इसलिए युधिष्ठिर का […]

काशी सत्संग: रूप या गुण

सम्राट चंद्रगुप्त ने एक दिन अपने प्रतिभाशाली मंत्री चाणक्य से कहा, “ कितना अच्छा होता कि तुम अगर रूपवान भी होते!” चाणक्य ने उत्तर दिया, “महाराज रूप तो मृगतृष्णा है। आदमी की पहचान तो गुण और बुद्धि से ही होती है, रूप से नहीं।” “क्या कोई ऐसा उदाहरण है, जहां गुण के सामने रूप फींका […]