भोले भण्डारी- द्वितीय पाठ

नरक में ठेलम-ठेल

भारतीय परम्परा में स्वर्ग का अपना महत्व है। जाने-अनजाने हर भारतीय स्वर्ग के मोहपाश में बंधकर जीवन पर्यन्त सत्कर्मों के इर्द-गिर्द ही अपना जीवन व्यतीत कर रहा होता है। अगर भूले से कोई पाप हो भी जाए, तो मनुष्य जीवनकाल में ही उसका प्रायश्चित करना ज्यादा श्रेयकर मानता है। इसके विपरीत नरक को हीन भावना से देखा जाता है कि बात-बात में लोग परलोक से पापी को जुबानी ही निष्काषित कर देते हैं। मुहजबानी इस स्वर्ग-नरक की प्राप्ति के खेल से ऊपर न तो कोई सोचता है, न ही किसी दूसरे को सोचने का समय देता है।

बात उस समय की है, जब भारत में सतयुग हुआ करता था। सत्य बोलने का ट्रेंड इतना प्रचंड था कि लोग सत्यबल से ही स्वर्ग प्राप्ति कर लेते थे। सतयुग के आस-पास ही राक्षसों की जमात उत्पन्न हुई, जिन्होंने नरक प्राप्ति के नए-नए मार्ग खोजना शुरू किया। वो तत्कालीन स्वर्ग के ट्रेंड से हटकर कुछ पॉपुलर करना चाहते थे। मदिरा का सेवन, मांस खाना, लोगों पर अत्याचार करना, झूठ बोलना, खून-खराबा करना इत्यादि इत्यादि इन्हीं राक्षसों के इन्वेंशन हैं। इसमें सबसे प्रचलित मार्ग था तपस्या कर देवताओं से वरदान प्राप्त करना और फिर लोगों पर अत्याचार करते हुए स्वर्ग पर आक्रमण। एक बार जब इन पापकर्मी राक्षसों ने नरक का ट्रेंड शुरू कर दिया, तो बहुत से लोगों ने इन्हें फॉलो करते हुए नरक को प्रचलित कर दिया।

नरक की गरिमा दिनों-दिन बढ़ती रही और सतयुग, द्वापर, और त्रेता होते हुए लोग कलियुग ले आए। कलियुग की महिमा ऐसी बढ़ी कि मनुष्य रूप ही पाप का द्योतक हो गया। नरक का तत्कालीन ट्रेंड इतना प्रसिद्ध है कि यहाँ जाने वालों की लम्बी लाइन लगी रहती है। हर कलियुग वासी अपने परम गंतव्य की और तेजी से भाग रहा मालूम होता है। राक्षसों द्वारा खोजे स्वर्ग आक्रमण के मार्ग से आगे बढ़कर तत्कालीन लोगों ने नरक पर पूर्ण आधिपत्य पा लिया है। वहां की गरिमा दिनों-दिन बढ़ रही है और अब तो हाल ये है कि देवता भी वहां रहने को लालायित रहते हैं।

हमने भी रोगग्रस्त होते हुए लगभग मरणासन्न अवस्था में वहां की सैर की है। हमारा नरक का विवरण मौलिक और सत्य है। हमने वहा खूबसूरत अप्सराओं को भी देखा है। और खानसामों की एक लम्बी जमात देखी है, जो नरक का सुख भोगवाते हैं। नरक के शुद्ध तेल में इक बार मनुष्य को तलने का जो आनंद है वैसा आनंद बैकुंठ में भी नहीं है। आत्मा तरोताजा होकर ही उस तेल से निकलती है। यमराज तो स्वयं आठों पहर उस तेल में रहना चाहते हैं। नरक के भिन्न-भिन्न सुख ही सत्य हैं, बाकि जीवन तो मिथ्या समान है। हमने अपने अनुभव को अपने मित्रों से शेयर कर दिया है और इस विवरण को लिखकर जाने-अनजाने नरक की आबादी को बढ़ाने का कार्य भी कर दिया है। अब कलियुग का अंत-वंत नहीं होने वाला। होगा तो केवल इतना कि मनुष्य जल्द ही पृथ्वी पर ही नरक का निर्माण कर लेगा।

■ सिद्धार्थ सिंह

Post Author: kashipatrika

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