भोले भण्डारी- प्रथम पाठ

हर शहर का अपना मिजाज होता है, जिसके साथ न चाहते हुए भी सारे नगरवासियों को जोड़ लिया जाता है और शहर का मिजाज वहां रहने वालों के चारित्रिक गुण में एक प्रकार से चिपक जाता है। चिपकने वाले ये गुण कभी-कभी बदनुमा दाग भी नजर आते हैं। हंसना, रोना, खेलना, अत्यधिक मधुर बोलना और ज्यादा खाना जैसे भांति-भांति के गुण हैं, जिन्हें शहर विशेष और वहां के निवासियों से जोड़कर देखा जाता है। इनमें कुछ पुराने हैं, तो कुछ आधुनिक गुण भी हैं, जैसे बन्दुक चलाना, कम्प्यूटर पर गिट-पिट करना और हर प्रकार की आपराधिक गतिविधियां। इनके लिए मशहूर नगर या तो कश्मीर की घाटियों में पाए जाते हैं या मशीनीकृत दक्षिण भारत में।

ऐसे ही एक गुण विशेष से कभी बिहार के कई शहरों को पुकारा जाता था, जैसे; मुंगेर मतलब गोला-बम, गया मतलब होशियार और हाजीपुरिया मतलब सज्जन। उत्तर प्रदेश के इस प्रकार के शहरों में लखनऊ की नफासत और इलाहाबाद के पढ़ाकू अपने जमाने में काफी मशहूर हुए।

भला बनारस इससे कैसे अछूता रहता। हालांकि, बनारसियों के गुणों में अच्छे कम दुर्गुण ज्यादा जुड़ गए। बनारसियों के साथ इतने दुर्गुणनुमा गुण चिपके हुए हैं कि शहरवासी चलता-फिरता अजायब घर नजर आता है। शहरी गुणों की खान से दबा बनारसी शायद ही जीवन में कभी अपने इस अवतार से बाहर निकल पाता है। यहां गुणों की खान में हीरेनुमा शहर के साथ चिपका एक गुण है ‘धार्मिक’। इससे जुड़ी एक कथा है। कहते हैं इस कथा को रोज करने से जीवन विकारों से मुक्त होता है। कथा का पाठ कुछ इस प्रकार से है-

एक समय में काशी में एक नाविक रहता था। नास्तिक कहो या सात्विक वो सदैव हर बात में ‘महादेव’ का नाम लिया करता था। न रोजाना नहाना और न ही कभी मंदिर जाना, उसकी दिनचर्या सुबह की चिलम के साथ जो शुरू होती, तो रात को मदहोश हो सो जाने तक चलती रहती। गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप, नशा, खाने, बतियाने सभी में ‛महादेव’ का नाम इस प्रकार लेता कि लोग केवल इस एक शब्द से उसके सैकड़ों मनोभाव समझ लेते।

एक बार शहर में एक स्वामीजी आए। उन्होंने काशी के धार्मिक लोगों का नाम काफी सुना था, और ऐसे ही किसी संत की तलाश उन्हें यहां खींच लाई। शहर में चर्चा हो गई कि जो कोई भी स्वामीजी को शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, उसे स्वामीजी अपने साथ हिमालय अपने आश्रम ले जाएंगे। अब मस्तमौले ‘नाविक बनारसी’ के कानों में ये बात पड़ी, तो वह झटपट शास्त्रार्थ के लिए तैयार हो गया। शास्त्रार्थ से ज्यादा वो हिमालय की मनोरम वादियों को देखने का मोह छोड़ नहीं पाया।

स्वामीजी और उस नाविक का शास्त्रार्थ शुरू हुआ। स्वामीजी कुछ भी बोलते नाविक केवल ‛महादेव’ कह चुप हो जाता। पहले तो स्वामीजी उलझन में पड़े, परंतु जब शास्त्रार्थ आगे पढ़ा तो स्वामीजी भी नाविक के मनोभावों को केवल ‛महादेव’ शब्द से जोड़कर समझने लगे। गहन से गहन मुद्दों पर बात छिड़ी और अंत में स्वामीजी ने नाविक से आखिरी सवाल पूछा-

“महादेव का वास्तविक रूप क्या हैं ?”

नाविक ने निर्भीक होकर अपने ओर संकेत कर आखिरी बार ‘महादेव’ कहा। स्वामीजी समझ गए कि क्यों काशी के वासियों को धार्मिक कहते हैं। जिनकी दिनचर्या सुबह से शाम केवल ‛महादेव’ के नाम से होती हो, उसका पुण्य सैकड़ों वर्षों की तपस्या से भी ज्यादा होता है। फिर क्या था! स्वामीजी ने उस नाविक को आखिर सम्मानपूर्वक प्रणाम किया और उसे अपने साथ हिमालय ले गए।

■ सिद्धार्थ सिंह

Post Author: kashipatrika

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