बेबाक हस्तक्षेप

मैथिलीशरण गुप्त ने बड़ी सुंदर कविता लिखी है, जिसकी कुछ पंक्तियां हैं-
“हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी।”
इन दिनों राजनीतिक बयानबाजी से पटे अखबारों को सहेजते हुए सहसा ये पंक्तियां मन में कौंध गई और सोच की उड़ान कुछ पल उन दिनों में विचर आई, जब गुप्तजी ने यह लिखी होंगी। तब का राजनीतिक-सामाजिक परिवेश आज से बहुत बेहतर रहा होगा, फिर भी गिरते मानव मूल्यों ने उनका ध्यानाकर्षण किया होगा! और तिक्त होकर उन्होंने भारतीयों के मन-मस्तिष्क को जगाने के प्रयास स्वरूप ये रचना की होगी।
खैर, ये तब की बात थी। वर्तमान में लौटे तो, चुनावी मौसम में बयानों के तीर जमकर चल रहे हैं और मर्यादाओं को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया। परिवार तक को सियासी बदजुबानी का निशाना बनाने से रंचमात्र गुरेज नहीं किया जा रहा। जुबानी जंग के गिरते स्तर को किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष से जोड़कर देखा नहीं जा सकता, बल्कि हवा ही कुछ ऐसी चल रही है शायद! सियासत से इतर सोशल मीडिया पर भी समर्थन या विरोध में प्रयोग किए गए शब्दों के तमाम उदाहरण मिल जाएंगे, जिसे मर्यादा या भारतीय सभ्यता-संस्कृति के चश्मे से देखने तक की भूल भी नहीं की जा सकती! गिने-चुने लोगों को छोड़ शायद अब बहुतायत को ये भाषा-संस्कृति आकर्षक भी लग रही है। तभी तो, हर तरफ यही संस्कृति फलफूल ही नहीं रही, बल्कि विस्तारित भी हो रही है। फिर भी, राजनीतिकों-देशवासियों से अनुरोध स्वरूप गुप्तजी की पंक्तियों के साथ ही छोड़ जाती हूं-
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े…
■ सोनी सिंह

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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