बेबाक हस्तक्षेप

26/11 मुंबई में दहशत के दस साल

शुरुआत आदम गोवंडी की पंक्तियों से
“पार कर पाएगी ये कहना मुकम्मल भूल है,
इस अहद की सभ्यता नफरत के रेगिस्तान को।”
मुंबई की सड़कों पर दहशत के आज दस साल गुजर गए, पर लगता है कल की ही बात हो। पल-पल मृतकों की बढ़ती संख्या, नए जगह पर गोली चलने की खबर और घर से बाहर गए अपनों के लौटने की बेचैन करती फिकर। ऐसा लग रहा था दिमाग स्वतः कई दिशाओं में एक साथ काम कर रहा था। कान टीवी पर चल रही खबर, उसमें गोलीबारी की घटनाओं से जुड़ी जगहों को पूरी तरह सुन रहा था, लेकिन आंखें मोबाइल पर नंबर ढूंढने और अपने का हाल पूछने में कोई कोताही नहीं बरत रहीं थीं। अजीब सी स्थिति थी, समझना मुश्किल हो रहा था कि बाहर गए अपनों की फिकर करूं या घर में बचे हुए की सुरक्षा का इंतजाम। खैर, मुंबई का जिगर था, जो आतंक से थमा नहीं। आतंक के बीच दूसरी सुबह लोकल जस की तस चल रही थी और लोग सड़क पर रोजमर्रा की तरह निकले भी। पर जख्मों के निशान की तरह ही कुछ खौफनाक तस्वीरें यादों में कैद होकर यूं ताजा रह जाती हैं, जैसे कल की ही बात हो। कुछ समय तक उन जगहों पर आते-जाते वो भयावह तस्वीरें आंखों के सामने चलचित्र सी चलने लगती थी, फिर धीरे-धीरे जिंदगी अपने ढ़र्रे पर फिर लौट आई, किंतु आज भी 26/11 का दिन उस वक्त मुंबई में मौजूद हर एक के जेहन में जिंदा है।
बहरहाल, दस साल गुजर गए बहुत कुछ बदल गया, लेकिन आतंक का चेहरा नहीं बदला। न ही लोगों की आपसी नफरत में कमी आई। धर्म-जाति-परंपरा-आस्था…किसी न किसी नाम पर कत्ल का खेल बदस्तूर आज भी जारी है। “मन की बात” के 50वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इंसानियत और भारतीयता की बात करते हुए कहा कि “मई 2014 में जब मैंने एक ‘प्रधान-सेवक’ के रूप में कार्यभार संभाला, तो मेरे मन में इच्छा थी कि देश की एकता, भव्य इतिहास, उसका शौर्य, भारत की विविधताएं, हमारे समाज के रग-रग में समायी हुई अच्छाइयां, पुरुषार्थ, जज़्बा, त्याग, तपस्या इन सारी बातों को,जन-जन तक पहुंचाना चाहिए।” पर क्या सचमुच आज हर भारतीय प्रधानमंत्री की इस बात से इत्तेफाक रखता है और इस भारतीयता को जीवित रखने को कृत संकल्प है? सवाल पर दूसरों की तरफ न देख, अपने अंदर झांके, क्योंकि इसका जवाब आपसे बेहतर कोई नहीं दे सकता।
आदम गोवंडी की पंक्तियों के साथ ही अपनी बात खत्म करती हूं-
“बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को।
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख्वान को।”

■ संपादकीय

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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