बेबाक हस्तक्षेप

मुनव्वर राना की पंक्तियों से आज बात की शुरुआत करते हैं, उन्होंने लिखा है-
“हम तो शायर हैं सियासत नहीं आती हमको,
हम से मुंह देखकर लहजा नहीं बदला जाता।
पर सियासत के लिए जनता-जनता में भी फर्क है और उसे वक्त की नब्ज टटोलकर मुद्दा-बात-औकात-हालात सब बदलने आता है। यही उसकी खूबी है, तभी उसके पास कुर्सी है और हम सभी बे-कुर्सी।
खैर, चुनावी फिजा में अब मुद्दा बदल गया है और हवाओं में प्रभु श्रीराम ही तैर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच, विकास की एक छोटी बयार आई और कुछ लोगों को गुदगुदा गई वह है-‛बीजेपी का एक साल का विकास रिपोर्ट’ जिसके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी पर बीते एक साल में कई बड़ी कपंनियां मेहरबान हो गई और पार्टी ने 400 करोड़ रुपये से अधिक की योगदान राशि जुटा ली। एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक, बीजेपी द्वारा चुनाव आयोग को दी गई योगदान राशि का यह आंकड़ा बढ़ कर 1000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि बीजेपी ने अभी तक अपनी वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट पेश नहीं की है। हालांकि, इस मामले में कांग्रेस काफी फिसड्डी रह गई और वह सिर्फ 26 करोड़ रुपयों का चंदा जुटा सकी।
बहरहाल, इतना की विकास की रफ्तार सिर्फ आम जनता के लिए तेज नहीं हो सकी और चार साल में उसकी जेब में 15 लाख रुपयों में से एक लाख भी नहीं आ सके। बेरोजगारों की संख्या भी नहीं घट सकी, न ही महंगाई से पिंड छूटा। कोई नहीं अब फिर “आम” चुनाव नजदीक है, सो नई बातें फिजाओं में तैर रही हैं। अब ऐतबार और इंतजार के अलावा आम लोगों के पास विकल्प ही क्या है! पर मुन्नवर राणा की अगली पंक्तियों पर गौर कर इतना तो कह ही सकते हैं-
“जब रुलाया है तो, हंसने पर ना मजबूर करो,
रोज बीमार का नुस्खा नहीं बदला जाता।”
■ संपादकीय

Post Author: Soni

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