बेबाक हस्तक्षेप

‘मेले में भटके होते तो कोई घर पहुंचा जाता,
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे।’


दुष्यंत कुमारजी की ये पंक्तियां इन दिनों सामने आए ‘तबलीगी मरकज’ के लोगों पर एकदम फिट बैठती मालूम पड़ती है। पहले तो, विश्व में फैैली महामारी ‘कोरोना’ के बीच अपने और अपनों की तबीयत से बेपरवाह हो गुपचुप समूह में एकत्रित रहना, आयोजनों का जारी रहना और अब सच्चाई सामने आने के बाद भी खुद को यथासंभव प्रशासन के सामने न आने देने की पुरजोर कोशिश करना…कितने ही सवाल पैदा करता है, हम जैसे आम आदमी के मस्तिष्क में। क्योंकि, आम इंसान तो बीमार होने के ख्याल को भी आने आसपास फटकने नहीं देना चाहता। बीमारी के नाम से ही उसकी आम व्यवस्था चरमराने लगती है, अगर वह ज्यादा बीमार हो गया, तो रोजी-रोटी का क्या होगा, ऐसे में बीवी-बच्चों का क्या होगा, मां-पिता की दवा…जाने कितनी ही जिम्मेदरियां मुंह चिढ़ाने लगती हैं। ऐसे में, बड़ी संख्या में मरकज से निकले लोगों के कोरोना पॉजिटिव निकलने के बाद भी यह आम तबका छुपा रहना चाहता है, क्यों! समझ के परे है।
दूसरी ओर, मरकज में रोजाना सैकड़ों लोगों का आना-जाना, विदेशी नागरिकों का बड़ी संख्या में ऐसे समय में वहां मौजूद रहना जब सरकार विदेश से आए लोगों की निगरानी कर रही थी, पूरा मामला केंद्र-दिल्ली सरकार, पुलिस प्रशासन, खुफिया तंत्र सभी को कठघरे में खड़ा करती नजर आती है! इतना ही नहीं, अब मरकज की इमारत की वैधता और मंजिलों की गिनती गिनाने वाला नगर निगम पहले आंखें क्यों मूंदे था, यह भी समझना मुश्किल है, जबकि यह इमारत दिल्ली के किसी दूर-दराज कोने में न होकर शहर के बीचों-बीच स्थित है और पुलिस थाने से सटा भी है।
बहरहाल, सवाल तो कई और भी हैं, जैसे मरकज मुखिया मौलाना साद अभी तक पुलिस रडार में क्यों नहीं आया? उसकी इतनी बड़ी संपत्ति पर प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ी…साथ ही आशंका भी कि कहीं देश के अन्य कई ‘मान्यवरों’ की तरह वह भी अचानक विदेश पहुंच जाएगा और शायद अंतरराष्ट्रीय सीमाएं खुली होती, हवाई सेवाएं चलती रहती तो शायद अब तक देश से बाहर उड़ान भर भी चुका होता!! और देश का आम तबका फिर नए सिरे से मौलाना साद के वापस भारत लाने के सपने बुनता रहता, क्योंकि सच तो यही है कि आम लोगों को शासन-प्रशासन, मौलाना, मौलवी,पादरी, ज्योतिषियों… सभी रसूखदार लोगों की ओर से सिर्फ और सिर्फ सपने देखने की ही छूट है और यही सपनें वह अपनी भावी पीढ़ी के हाथों में भी सौंप जाता है कि एक दिन सब अच्छा होगा…
सच-भ्रम की इस उलझन के बीच फंसी आम सोच को उलझी छोड़ मैं अपनी बात गुलजार साहब की इन लाइनों के साथ खत्म करती हूं
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआं,
चूल्हे नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई,
कुछ रोज हो गये हैं, अब उठता नहीं धुआं।”

सोनी सिंह

Post Author: Soni

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