बेबाक हस्तक्षेप

“जैसे भी हो जी लेते हैं…” जी हां, जगजीत सिंह की गजल के बोल देश की जनता पर बिलकुल फिट बैठती है। सियासतदार तो आदि काल से ही समझदार हैं, सो जनता के इस ‛एडजेस्टमेंट’ को उन्होंने उनकी नियती पर कब चुपके से थोप दिया, तलाशना मुश्किल है। हां, ये जरूर है कि वक्त के साथ सियासतदार और समझदार होते गए। परिणामस्वरूप किसानों की समस्याएं, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की स्थिति, विकास, महंगाई जैसे विषय चुनावी सभाओं से लुप्त होते गए और आरोप-प्रत्यारोप के अस्त्र ‛असली’मुद्दों पर हावी होते गए।

अब आम जन दिन-रात जिन समस्याओं से रूबरू होता है, उसे छोड़कर राम मंदिर निर्माण, हिंदुत्व की रक्षा, ‛राफेल’ पर पास या फेल, नोटबंदी जैसे विषयों पर बहस कर रहा है। इस बहस को और बढ़ा-चढ़ाकर परोसने का काम “सोशल मीडिया” पर किया जा रहा है। बीबीसी द्वारा किए गए एक अध्ययन में भी यह बात सामने आई है कि भारत की प्रगति, हिंदू शक्ति, खोये हिंदू वैभव के बारे में फर्जी खबरें बिना जांचे-परखे साझा किया जा रहा है। इन संदेशों को साझा करते समय लोग महसूस करते हैं कि वे राष्ट्र निर्माण कर रहे हैं। इतना ही नहीं ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि सोशल साइटों खासकर ट्विटर पर मौजूद इन फर्जी खबरों से देश के उच्च पदस्थ सियासतदार भी अछूते नहीं हैं। उनके समर्थन वाले नेटवर्कों पर मौजूद खबर और फर्जी खबरों के स्रोत प्राय: एक ही होते हैं।

बहरहाल, देश की मीडिया भी खबरों को लेकर कई बार संदेह पैदा करती है और इन दिनों यह चलन बढ़ता ही जा रहा है। कभी-कभी तो लगता है दिल्ली की जहरीली होती हवा में देश की राजनीती का भी बराबर का योगदान है, मगर इसे परखने का कोई वैज्ञानिक पैमाना नहीं है। इसी लिए जनता ही और एडजेस्ट करने की विनम्रता दिखाए और राजनीति को हवा-हवाई होने दे।

■ संपादकीय

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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