बेबाक हस्तक्षेप

जौन एलिया ने बात बड़ी दुरुस्त कही है,
“जिंदगी का था अपना ऐश मगर
सब की सब इम्तिहान में गुजरी।”

सच ही है, बच्चों की जिंदगी स्कूली प्रश्न पत्रों में उलझ कर रह गई और आम आदमी की जिंदगी की जरूरतों में। लेकिन “खास” जो चुनावी मौसम में सियासतदारों को कहा जा सकता है, उन्हें भी इन दिनों इम्तहान से आराम नहीं है। कांग्रेस ने कई राज्यों में सत्ता सुख तो लपक लिया, लेकिन आपसी खींचतान बरकरार है। उधर, महागठबंधन को डोर से बांधा जा रहा है, किंतु उसके छोर का पता-ठिकाना अभी बताना मुश्किल है।
अब जब सभी अपना-अपना इम्तहान दे रहे है, तो वर्तमान केंद्रीय सत्ता इससे अछूती कैसे रहती? वैसे भी, यह 2014 नहीं है, सो समीकरण बदल चुके है और हवा भी। ‘मोदी’ नामक आंधी का प्रभाव कम होते ही एनडीए सहयोगी आंखें तरेर रहे हैं और उनके तीखे तेवर झेलना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मजबूरी बन गया है। खैर, मोदी और शाह, दोनों नए सिरे से गठबंधन का ताना-बाना बुनने में जुटे हैं और अपनों को मनाने की कसरत बिहार से यूपी तक बरकरार है। कुल मिलाकर, ज्यों-ज्यों परीक्षा की घड़ी निकट आ रही है, कहा कितना फायदा ये सोच-समझकर पत्ते बिछाने की जुगत लगाई जा रही है। ऐसे में राजनीति को लेकर कोई भी भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि रोज नित नए समीकरण बनेंगे, जो लोकसभा चुनाव परिणाम आने तक बनते-बिगड़ते रहेंगे। फिलहाल, मेरे जेहन में गोपालदास नीरज की कुछ पंक्तियां आ गई-
जितना कम सामान रहेगा,
उतना सफर आसान रहेगा,
जितनी भारी गठरी होगी,
उतना तू हैरान रहेगा।

■ सोनी सिंह

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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