ख्वाब इस आँखों से अब कोई चुरा कर ले जाये

ख्वाब इस आँखों से अब कोई चुरा कर ले जाये,
कब्र के सूखे हुये फूल उठा कर ले जाये।

मुंतजिर* फूल में खुश्बू की तरह हूँ कब से,
कोई झोंकें की तरह आये उड़ा कर ले जाये।

ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी,
जो हथेली पे रची मेहंदी उड़ा कर ले जाये।

मैं मोहब्बत से महकता हुआ खत हूँ मुझ को,
जिन्दगी अपनी किताबों में दबा कर ले जाये।

खाक इंसाफ है नाबीना बुतों के आगे,
रात थाली में चिरागों को सजा कर ले जाये।
■ बशीर बद्र
* मुंतजिर- इंतजार करना

Post Author: Soni

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