काशी सत्संग : सर्मपण और अहंकार

पेड़ की सबसे ऊंची डाली पर लटक रहा नारियल रोज नीचे नदी में पड़े पत्थर पर हंसता और कहता, “तुम्हारी तकदीर में भी बस एक जगह पड़े रह कर, नदी की धारओं के प्रवाह को सहन करना ही लिखा है, देखना एक दिन यूं ही पड़े-पड़े घिस जाओगे। मुझे देखो कैसी शान से उपर बैठा […]

बेबाक हस्तक्षेप

बजट को लेकर आम आदमी का लंबा इंतजार आखिर 1 फरवरी को खत्म हुआ, जब वित्त मंत्री ने सदन के पटल पर वर्ष 2021-22 का आम बजट रखा। टेलीविजन की ओर टकटकी लगाए लोग वित्तमंत्री की हर बात को गौर से सुन रहे थे, क्योंकि लगभग सालभर से कोरोना से जूझ रहे लोगों को सरकार […]

काशी सत्संग : अपशब्द और संत

एक विद्वान संत एक दिन अपने एक अनुयायी के साथ सुबह की सैर कर रहे थे । अचानक एक व्यक्ति उनके निकट आया और उन्हें अपशब्द कहने लगा, लेकिन संत फिर भी मुस्कुराते हुए चलते रहे । उस व्यक्ति ने देखा कि संत पर कोई असर नहीं हुआ, तो वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो […]

काशी सत्संग : आखिरी दरवाजा

एक बार की बात है, दो राजाओं में युद्ध हुआ। विजयी राजा ने हारे हुए राजा के किले को घेर लिया और उसके सभी विश्वासपात्र अधिकारियों को बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया। उन कैदियों में पराजित राजा का युवा मंत्री और उसकी पत्नी भी थे। दोनों को किले के एक विशेष हिस्से में कैद […]

काशी सत्संग : संतोष से सुख

एक सेठजी का आकस्मिक स्वर्गवास हो गया। उनके बाद उनका लड़का मालिक बना। उसने एक दिन अपने पुराने मुनीमजी से पूछा कि मुनीमजी हमारे पास कितना धन है? मुनीम ने सोचा अभी यह लड़का है, इससे क्या कहें, क्या न कहें। मुनीमजी ने कहा-“सेठजी, आपके पास इतना धन है कि आपकी तेरह पीढ़ी बैठे-बैठे खा […]

काशी सत्संग : अहं का विसर्जन

एक ऋषि थे-सर्वथा सहज, निराभिमानी, वैरागी और अत्यधिक ज्ञानी। दूर-दूर से लोग उनके पास ज्ञान अर्जन करने के लिए आते थे। एक दिन एक युवक ने आकर उनके समक्ष शिष्य बनने की इच्छा प्रकट की। ऋषि ने सहमति दे दी। वह ऋषि के पास रहने लगा। वह ऋषि की शिक्षा को पूर्ण मनोयोग से ग्रहण […]

काशी सत्संग : फूलदान में जान!

जापान में एक बहुत सनकी सम्राट था। वह छोटी- छोटी गलती के लिए बड़ा दंड दे देता था, इसलिए प्रजा उससे बहुत भयभीत रहती थी। सम्राट के पास बीस फूलदानों का एक अतिसुंदर संग्रह था। उस पर सम्राट बड़ा गर्व था। वह अपने महल में आने वाले अतिथियों को यह संग्रह अवश्य दिखाता था। एक […]

काशी सत्संग : सबसे बड़ा मूर्ख

एक साधु रोज नगरवासियों से भिक्षा मांग कर जीवनयापन करता था। एक दिन उसके मन में तीर्थयात्रा का विचार आया, लेकिन वह सोच में पड़ गया कि रास्ते के खर्च के लिए धन का इंतजाम कैसे हो! उसी नगर में एक कंजूस सेठ रहता था। साधु ने उसके पास जाकर कुछ सहयोग की विनती की। […]

काशी सत्संग : पुण्यभूमि

स्वामीजी लगभग चार वर्ष तक विदेश में रहे । वहां उन्होंने लोगों के मन में भारत के बारे में व्याप्त भ्रमों को दूर किया तथा हिन्दू धर्म की विजय पताका सर्वत्र फहरायी । जब वे भारत लौटे, तो उनके स्वागत के लिए रामेश्वरम के पास रामनाड के समुद्र तट पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र […]

काशी सत्संग : सेवक और मालकिन

श्रावस्ती में विदेहिका नाम की एक धनी स्त्री रहती थी। वह अपने शांत और सौम्य व्यवहार के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। वेदेहिका के घर में एक नौकर था। नौकर अपने काम और आचरण में बहुत कुशल और वफादार था। एक दिन उसने सोचा,’सभी लोग कहते है कि मेरी मालकिन बहुत शांत स्वभाव वाली है […]