काशी सत्संग: क्रोध और कागज!

सेना के एक प्रमुख अधिकारी ने अमेरिका के तत्कालीन रक्षा-मंत्री के आर्डर को ठीक से न समझ पाने के कारण कोई भूल कर दी। जब रक्षामंत्री को यह बात पता चली तो वो गुस्से से लाल हो गए। नजदीक ही अब्राहम लिंकन खड़े हुए थे। लिंकन के पूछने पर रक्षामंत्री ने उन्हें विस्तार से पूरी […]

काशी सत्संग: जीत का सिक्का

बात उस समय की है, जब जापान में दो राज्यों के बीच युद्ध चल रहा था। युद्ध अपने चरम पर था। आने वाला कल युद्ध का आखिरी दिन था। ऐसे कठिन समय में जापान के एक राज्य के सेनापति ने अपनी सेना के समस्त सरदारों के साथ बैठक की। बैठक में पक्ष और विपक्ष की […]

काशी सत्संग: मन पर जीत

एक बार एक साधक ने कन्फ्यूशियस से पूछा,’मैं मन पर संयम कैसे रखूं?’ कन्फ्यूशियस ने उस व्यक्ति से पूछा, ‘क्या तुम कानों से सुनते हो?’ साधक ने कहा, ‘हां, मैं कानों से ही सुनता हूं।’ तब कन्फ्यूशियस ने कहा, ‘मैं नहीं मान सकता, तुम मन से भी सुनते हो और उसे सुनकर अशांत हो जाते […]

काशी सत्संग: कुशल नेतृत्व का गुण

बात उस समय की है, जब नेपोलियन सेना के साथ युद्ध में लड़ रहा था। उन दिनों संदेश घुड़सवारों के जरिए भेजे जाते थे। नेपोलियन अपने कैम्प में अपने मंत्रियों से चर्चा कर रहा था, तभी एक सन्देश वाहक बड़ी तेजी से आया। कैम्प के पास पहुंचते ही थकान, भूख, और प्यास से उसका घोड़ा […]

काशी सत्संग: अंधश्रद्धा

महादेवी वर्मा हिन्दी की प्रसिद्ध कवयित्री हैं, उनके जीवन से जुड़ी एक घटना है। बात उन दिनों की है जब महादेवी छात्रा थीं। अचनाक उनके मन में भिक्षुणी बनने का विचार आया। उन्होंने लंका के बौद्ध विहार में महास्थविर को पत्र लिखा…’मैं बौद्धभिक्षुणी बनना चाहती हूं। दीक्षा के लिए लंका आऊं या आप भारत आएंगे?’ […]

काशी सत्संग: गुरु कृपा और ज्ञान

महाकश्यप भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य थे। बुद्ध उनकी त्याग भावना तथा ज्ञान से संतुष्ट होकर बोले- ‘वत्स, तुम आत्मज्ञान से पूरी तरह मंडित हो। तुम्हारे पास वह सब है, जो मेरे पास है। अब जाओ और सत्संदेश का जगह-जगह प्रचार-प्रसार करो।’ महाकश्यप ने ये शब्द सुने, तो वे मायूस हो गए। वह बोले, ‘गुरुदेव […]

काशी सत्संग: असली इंसान

एक नगर के नजदीक एक होटल था। जिसका मालिक दयालु और सज्जन व्यक्ति था। होटल अच्छी आमदनी देता था। उस सेठ का जीवन सुख से चल रहा था। परिवार में उसके कोई नहीं था, माता-पिता का देहांत काफी समय पहले हो चुका था। उसका विवाह भी नहीं हुआ था। लालचंद्र की एक विशेषता थी कि […]

काशी सत्संग: बालक की निर्भीकता

बहुत समय पहले बिले नामक एक विद्यार्थी था। उसकी खासियत थी कि वह खेलने के समय दिल लगाकर खेलता और पढ़ने के समय एकाग्रचित्त होकर पढ़ता। बिले साहसी था, अपने इसी गुण के कारण वह वृक्षों पर चढ़ जाता। यह सब कुछ देखकर उसके दादाजी को भय लगता। कहीं बिले उन वृक्षों से गिर न […]

काशी सत्संग: अभिमान का मानचित्र

बहुत पुरानी बात है, एक सेठ था दिल का उदार। उसके पास विलासिता की सभी वस्तुएं मौजूद थीं। एक दिन वह संत को अपना बंगला दिखाने लाया। संत अलमस्त थे और सेठ अपने बड़प्पन की डीगें हांकने में व्यस्त था। संत को उसकी हर बात में अहम् ही नजर आता था। संत ने उसकी मैं-मैं […]

काशी सत्संग: घृणा किससे!

संत राबिया किसी धर्मग्रंथ का अध्ययन कर रही थीं। अचानक उनकी निगाह एक शब्द पर आकर रुक गई। वह शब्द था, ‘दुर्जनों से घृणा करो?’ वे कुछ देर तक उसी को दोहराती रहीं, फिर उन्होंने उस पंक्ति को काट दिया। कुछ समय बाद दो संत उनके घर आए, सामने रखे ग्रंथ पर उनकी निगाह पड़ी, […]