काशी सत्संग : आचरण बिन, सत्संग व्यर्थ

एक संत ने अपने दो शिष्यों को दो अलग-अलग डिब्बों में बीज दिया और शिष्यों से कहा- ये बीज सड़े गले नहीं, बल्कि बढ़े-चढ़े यह ध्यान रखना। दो वर्ष बाद जब हम वापस आएंगे, तो इन्हें ले लेंगे।संत तीर्थयात्रा के लिए चले गए। इधर एक शिष्य ने बीज के डिब्बे को पूजा के स्थान पर […]

काशी सत्संग : दर्पण की सीख

पुराने जमाने की बात है। एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी। शिष्य उस दिव्य दर्पण […]

काशी सत्संग : खाली मन में ‘राम’

एक संन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आया। दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे। संन्यासी के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए संन्यासी ने दुकानदार से पूछा, इसमें क्या है?दुकानदार ने कहा:- इसमें नमक है।संन्यासी ने फिर पूछा- इसके पास वाले में क्या है?दुकानदार ने कहा- इसमें हल्दी है।इसी प्रकार […]

काशी सत्संग : श्रद्धा और समर्पण

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा।दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब […]

काशी सत्संग: “चार बात”

एक राजा के विशाल महल में एक सुंदर वाटिका थी, जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी। वहां रोज एक चिड़िया आती और मीठे अंगूर चुन-चुनकर खा जाती और अधपके और खट्टे अंगूरों को नीचे गिरा देती। माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की, पर वह हाथ नहीं आई। हताश होकर एक दिन […]

काशी सत्संग : माया की लीला

श्रीहरि के परम भक्त देवर्षि नारद के मन में एक बार जिज्ञासा जगी कि इस माया की लीला आखिर है क्या? नारद जी ने अपनी यह जिज्ञासा भगवान श्रीहरि के समक्ष रखी। भगवान विष्णु मुस्कराए, फिर नारद जी से कहा- “उत्तर के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करो।”एक दिन अनायास भगवान विष्णु ने उनसे कहा- […]

काशी सत्संग : जोड़ने वाला श्रेष्ठ

एक दिन स्कूल की छुट्टी जल्दी हो जाने से एक दर्जी का पुत्र स्कूल से सीधा अपने पिता की दुकान पर पहुंच गया। वहां जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पिता को काम करते हुए देखने लगा, जो सिलाई में व्यस्त थे। उसने देखा कि उसके पिता कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची […]

काशी सत्संग : मान-अपमान, सब समान

एक बार गौतम बुद्ध एक गांव से गुजरे। गांव के कुछ लोग उनकी वेशभूषा देख उनका उपहास और अपमान करने लगे। तथागत ने कहा-“यदि आप लोगों की बात समाप्त हो गई हो, तो मैं यहां से जाऊं। मुझे दूसरे स्थान पर भी पहुंचना है।” बुद्ध की बात सुनकर ग्रामीण हैरान थे।उन्होंने भगवान बुद्ध से पूछा, […]

काशी सत्संग : कर्तव्य और पुण्य

एक बहुत न्यायप्रिय राजा थे। वे अपना राज्यकोश प्रजा के हित साधन में लगा देते थे। उनके राज्य में चारों ओर खुशहाली थी। एक बार पड़ोसी देश के राजा ने उन पर आक्रमण कर दिया और उन्हें अपनी पत्नी-बच्चों के साथ राजपाट छोड़कर भागना पड़ा। राजा सपरिवार भटकते-भटकते पड़ोसी राज्य में पहुंचे। वहां कामकाज करने […]

काशी सत्संग : झूठा चेहरा

एक राजा से एक चित्रकार ने अनुरोध किया- राजन, क्या मैं आपका चित्र बना सकता हूं? राजा ने अनुमति देते हुए कहा-जिस प्रकार चंद्रमा तारों के बीच सुशोभित होता है, उसी प्रकार सभासदों के साथ मेरा चित्र बनाओ। चित्रकार को दूसरे दिन आने के लिए कहा गया। यह बात दरबार में फैल गई। रात में […]