आस्था की महाडुबकी

सत्यं नास्ति तपः शौचं, दया दानं न विद्यते।
उदरम्भरिणो जीवा, वराकाः कूटभाषिणः।।

इस युग में सत्य खो रहा है, तपस्या लुप्तप्राय हो गई है, शुद्धता भी नगण्य है, दया-धर्म और दान लोगों से दूर हो गए हैं। आज का मनुष्य सिर्फ और सिर्फ अपना पेट भरने में लगा है, बहुत आलसी हो गया है और छल कपट झूठ से स्वार्थ साधन में ही लगा रहता है। यह दुनिया सज्जनों के लिए दूभर हो गई है।
कहते हैं कलि देवता के युग में मनुष्य की मानसिकता दूषित हो जाएगी। शायद यही वजह है कि वर्तमान युग में मनुष्यता बिगड़ गई है। कहने को तो सब युग का प्रभाव और संगत का परिणाम कहते हैं, पर सुधरने को कोई तैयार नहीं है। क्योंकि हर मनुष्य को कमियां अपने में नहीं, दूसरे में दिखती है। जब तक मनुष्य अपनी कमी ढूंडने और सुधारने का प्रयास नहीं करता, तब तक वह समाज का या स्वयं अपना कल्याण नहीं कर सकता!
हालांकि, तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद युग-युगांतर से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चिरयुवा रही हमारी आस्था इस कदर हमारे अंतस से घुली है, मानो सांसों की डोर। इसी आस्था का महाप्रतीक यानी महाकुंभ 12 वर्षों बाद एक बार फिर तीर्थराज प्रयाग में आ रहा है। यह संयोग अब अगले 12 सालों बाद ही होगा। यानि पूरी एक पीढ़ी इस महाउत्सव की साक्षी बन रही है और इस बार गिनीज बुक ने भी इस पर नजर रखी है, ताकि इतिहास में इसे बतौर रेकॉर्ड दर्ज किया जा सके। दुनिया के सबसे बड़े आयोजन में इस बार पारंपरिक तंबुओं के साथ ‘पांच सितारा’ सुविधाओं वाली टेंट सिटी भी होगी। पांच हजार कॉटेज वाले महाकुंभ में तीन तरह के टेंट होंगे, जहां श्रद्धालु अत्याधुनिक सुविधाओं का आनंद भी उठा सकेंगे।

महाकुंभ का पौराणिक माहात्म्य
यूं तो ‘कलश’को कुंभ कहते हैं, लेकिन यहां इसका संबंध अमृत कलश से है, जो समुद्र-मंथन की पौराणिक कथा में निहित है। धन्वंतरि से मिले अमृत कलश को जब दानवों से बचाने के लिए इंद्र-पुत्र जयंत भाग रहे थे, तब इसकी बूंदें हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयागराज में गिरीं। सूर्य, चंद्र, शनि, बृहस्पति भी इसकी रक्षा कर रहे थे और विभिन्न राशियों (सिंह, कुंभ एवं मेष) में विचरण से ये कुंभ पर्व के द्योतक बन गए। प्रयागराज में गंगा, यमुना, सरस्वती के त्रिवेणी संगम में महाकुंभ के दौरान डुबकी से अनेक देवस्थानों के दिव्य दर्शन का पुण्य माना जाता है। मान्यता है कि इससे समस्त पापों का नाश होता है तथा मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

तीर्थराज प्रयाग से पौराणिक नाता
महाकुंभ की जनश्रुति को लेकर शोध जारी है कि इसने तीर्थयात्रियों को कब आकर्षित किया, लेकिन तीर्थराज प्रयाग इसका शुरू से केंद्र बिंदु रहा है। ऐतिहासिक साक्ष्य राजा हर्षवर्धन के शासन काल (664 ईसा पूर्व) को संकेतित करते हैं, जब कुंभ मेला व्यापक मान्यता पाया। ह्वेनसांग की यात्रा वृत्तांत में कुंभ मेला की महानता का उल्लेख है, जिसके तहत राजा हर्ष पवित्र नदियों के संगम की रेत पर एक महान पंचवर्षीय सम्मेलन आयोजित करते थे। प्रयागराज के कुंभमेले को ज्ञान एवं प्रकाश के स्रोत के रूप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रीय रूप से ब्रह्माजी ने गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर अश्वमेघ यज्ञ कर सृष्टि का सृजन किया था।

वसुधैव कुटुंबकम का द्योतक
वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा के साथ आदर्श विचारों एवं गूढ़ ज्ञान का आदान-प्रदान महाकुंभ की थाती है। यह विश्व का इकलौता महापर्व है, जहां कोई आमंत्रण अपेक्षित नहीं और करोड़ों तीर्थयात्री इसे मनाने के लिए एकत्र होते हैं। इसका सामाजिक पक्ष विभिन्न यज्ञों, वेद मंत्रों का उच्चारण, प्रवचन, नृत्य, भक्ति भाव के गीतों, आध्यात्मिक कथानकों पर आधारित कार्यक्रमों, प्रार्थनाओं, धार्मिक सभाओं के इर्द-गिर्द है। यहां सिद्धांतों पर आधारित वाद-विवाद एवं विमर्श प्रसिद्ध साधु-संतों द्वारा किया जाता है। यहां जरूरतमंदों एवं वंचितों को अन्न-वस्त्रादि दान-कर्म, संतों को आध्यात्मिक भाव से गाय एवं स्वर्ण दान की परंपरा है।
काशी पत्रिका

Post Author: kashipatrika

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