‛राजनीति’ के घाट पर, भई ‘भक्तन’ की भीड़

राजनीति में दिन-ब-दिन भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही है। बस! नए भक्तगण कुछ दुविधा में दिखते हैं। दुविधा इस बात की कि ‛किस प्रभु से नाता जोड़ा जाए, जिसके सहारे सत्ता रूपी वनवास छोड़ा जाए।’ तो वे कभी शिव, तो कभी प्रभु श्रीराम की शरण में जाते हैं, दोनों ही द्वारों पर बारी-बारी से शीश नवाते हैं। खैर, हम ठहरे ‛आम भक्त’ सो नाम से हमारी भक्ति का वास्ता कम ही है। कभी आस्था, तो कभी जरूरत से हर दर पर जाते हैं और वार यानी सोम, मंगल…के हिसाब से हर दरवाजा खटखटाते हैं। पर भला हो इन जनसेवकों का जो बीते कई वर्षों से हमारी उलझन को सुलझा दिया है और ‛राम नामी’ थमा दिया है। अब मन-मंदिर तो क्या हम समाचारों में भी अयोध्या और श्रीराम तलाशते हैं और जब भी कोई खड़ाऊ दिख जाए अनजाने ही पांव पखारते हैं। चूक एक ही हुई जीवन में कि ‛राम’ का चुनाव करते वक्त हम भूल गए कि वे 14 साल के वनवास पर जब जाएंगे, तब हमारी मदद को कैसे आएंगे? जब होश आया, तो हमने अक्ल का घोड़ा दौड़ाया, फिर सोच-विचारकर भोलेनाथ में मन रमाया। अब जब श्रीराम वनवास पर होते हैं, तो हम भोले-भोले करते हैं। आप भी अगर हमारी तरह आम भक्त हैं, तो जय भोलेनाथ कहिए और यदि आप ‛खास’ हैं, तो ईश्वर बदलते ही हमें भी पता बताइए, किस दर पर मत्था टेके रस्ता बताइए, क्योंकि आपकी भक्ति में ज्यादा शक्ति है, आप इतना बड़ा देश चलाते हैं, हम तो एक अपना घर चलाने में ही मंहगाई के आगे ‛फुस्स’ पड़ जाते हैं।

सोनी सिंह

Post Author: Soni

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