‘अमृत-वाणी’-ऊर्जा स्वमं को सुधारने में ख़र्च करो…

व्यक्ति की वाणी दूसरों पर जो प्रभाव डालती है वह उसके रूप-रंग औऱ समाजिक स्थिति के सापेक्ष नहीं होता। व्यक्ति के जेब मे एक फूटी कौड़ी भी न हो पर जब वह ज्ञान की बात करता है तो लोग सुनते ही हैं ऐसे ही व्यक्ति अगर ज्ञानी भी हो लेक़िन वाणी में ज्ञानी होने का अभिमान भरा हो, दूसरों को कमतर दिखाने के लिए ही ज्ञान अर्जित किया हो तब वैसा ज्ञानी भी दूसरों को अपने से दूर ही करता है।

सनातन; नाम का ही सनातन नहीं था, उसका नाम उसके व्यक्तित्व को ही शाब्दिक अर्थ देता था। भारतवर्ष के इतिहास से वर्तमान तक़ उसकी पकड़ थी। बहुत पढ़ा-लिखा तो था ही कद काठी भी ऐसी की लोगों को अपना मित्र बना ले। कमी थी तो एक ही, के अपने को ज्ञानी वह स्वमं भी मान बैठा था। सबसे अकड़ के मिकता, वाणी को सबसे ऊंचा ही रखता। कटाक्ष करते कभी नहीं चूकता, दूसरों को अज्ञानी और अल्पज्ञानी सिद्ध करना ही उसका उद्देश्य बन गया था। एक रोज़ एक दस-बारह साल का बालक उसके घर अपने पिता जी के साथ आया हुआ था,पिता औऱ सनातन में देशहित की बात चल रही थी। सनातन का मानना था के देश को पहचान दिलाने में मातृभाषा की भूमिका बहुत है सो हिंदी ही शिक्षा का माध्यम होना चाहिए वही पिता का मानना था कि इससे आधारभूत बदलाव नहीं होगा, भाषा विकास का धोतक नहीं। सनातन आदतन अपनी आवाज़ ऊँची करता गया।तभी पिता के साथ आये अबोध बालक ने अपनी सौम्य वाणी में कहा,’अंकल’औऱ सनातन ने प्यार से उसकी तरफ़ दृष्टि की, तभी बच्चे ने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा ‘चाचा जी’, औऱ सनातन आगे बढ़ते-बढ़ते रूक गया। वो बच्चे की इस हरक़त के बारे में सोच ही रहा था के बच्चे ने बोला, ‘अंकल, चिल्लाने पर हिंदी भी प्रभाव खो देती है और ठीक से बोला जाए तो अंग्रेजी में भी समझ जाते है।’ फ़िर बालक सनातन के पैरों को दोनों हाथ से पकड़ता हुआ उससे लिपट गया औऱ धीरे से माफ़ी माँगी।
कोई बड़ा होता तो सनातन संभवत और रुष्ट होता पर बालक की सीधी भाषा उसके मन को छू गयी, उसकी वाणी उस पल से ही मधुर हो गयी। अब सनातन सम्पूर्ण हो गया था।
Aditi
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Post Author: Aditi

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