अमृत-वाणी -‘ तुममें ‘मैं’ समा चूका था सो मित्र के लिए भी तुम्हारे हृदय में कोई स्थान शेष नहीं बचा था। …

एक व्यापारी था जिसने अपना व्यवसाय बहुत ही बढ़ा लिया था , उसको इस बात का बहुत ही घमंड हुआ के उसने सब कुच्छ अपने बल पर किया।  अब उसका एक मित्र भी था जिसका कोई भी व्यवसाय ठीक नहीं चल पाया, आखिरकार उसने फूल माला बेचने का काम शुरू किया क्यूंकि उसके अपनी फुलवारी के फूल थे।
सफल व्यापारी ने उस मित्र के इस छोटे  घरेलू व्यवसाय का बहुत ही मज़ाक बनाया करता था।
एक रात भीषण आंधी में सफल व्यापारी का सारा व्यवसाय ही हवा हो गया।  लेकिन फ़ूल गिर कर भी उस छोटे व्यापारी के काम आ गये।
सफल व्यापारी भगवान के चरण पकड़ कर रोने लगा तब स्वप्न में भगवन बोले ,’ तुममें ‘मैं’ समा चूका था सो मित्र के लिए भी तुम्हारे हृदय में कोई स्थान शेष नहीं बचा था।  जबकि देने वाला तो तुम्हारा ईष्ट है। उसने जब ठीक समझा दिया जब लगा बहुत दे दिया है तो वापस ले  लिया।  जाओ और चींटी की तरह पुनः मित्र के साथ पंक्तिबद्ध हो कर चलना सीखो।  कल्याण होगा। ‘ अब उसकी निद्रा ही नहीं आँखे भी खुल चुकि थी।
वह सब कुछ , अच्छा-बुरा भगवान को सौप कर धन्यवाद करता हुआ आगे बढ़ने लगा।
अदिति 
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Post Author: Aditi

Loves to write and Paint. Cartoonist by heart and Content by nature

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