‘अमृत-वाणी’- मन को कुढ़ने दो…

कभी-कभी हम अपनों के मन में बढ़ रही दूरी को भी कुर्सी पर जम रही धूल को साफ़ करने जितना आसान समझ लेते है। के समय मिलने पर झाड़ – पोछ कर साफ कर देंगे। अभी मन को मैला होने दो। उसको कुढ़ने दो।  

पर क्या मनुष्य का मन एक निर्जीव कुर्सी सरीखा है भी, नहीं। संभवतः समझने की बात है अनुभव करने की बात है। मानव जीवन हर रोज़ ही घटता है, शून्य की तरफ न सही पर पूर्ण होने को घटता तो है। किस छण विलीन हो जाये क्या पता। तब हमारे मन पर वह पछतावे का बोझ छोड़ जाएगा जो उमर भर बढ़ता जाता है। जाने वाले की उम्मीद पर  पूरा नहीं उतरने की। उसकी बनती- मिटती आशाओं से भरे मन को समझते हुए भी कल पर टालने की।
कुत्ते का नन्हा बच्चा खाना मांग रहा था। सुबह देते है ऐसा सोचकर चौकीदार ने गेट लगा लिया। वह बच्चा सुबह किसी गाड़ी के नीचे दबकर मरा हुआ ही उस चौकीदार को फ़िर मिला।
‘काश के खाना भर खिला पाता। अब तो मैं पाप का  भागी बन गया, क्या पता भूखे पेट खाने की तलाश में ही इतनी दूर सड़क तक़ पहुँच गया हो।’
चौकीदार दिन भर यही सोचता रह गया।

Post Author: Aditi

Loves to write and Paint. Cartoonist by heart and Content by nature

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