“अक्षय काशी, अक्षय तृतीया”

आज यानी 07 मई, मंगलवार अक्षय तृतीया है। ‘अक्षय’ शब्द का मतलब है- जिसका क्षय या नाश न हो। इस दिन किया हुआ जप, तप, ज्ञान तथा दान अक्षय फल देने वाला होता है अतः इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं। अक्षय तृतीया के दिन काशी में भी अक्षय पुण्य फल कामना से स्नान-दान, नियम-संयम-व्रत का विधान है। मान्यता है कि इस दिन कोई शुभ कार्य, दान, सामाजिक संस्कार आदि के साथ क्रय-विक्रय भी अक्षय हो जाता है।
कहते हैं देवाधिदेव की नगरी काशी स्वयं अक्षय है, जहां सभी देवी-देवताओं का वास है। अक्षय तृतीया का भी यहां खासा महत्व है। महादेव की ग्रीष्मानुभूति से मुक्ति के लिए अक्षय तृतीया पर श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर गर्भगृह में स्वर्ण जलधरी लगाई जाती है। जलाधरी की शीतल फुहार बाबा को शीतलता प्रदान करती है। इसी दिन बाबा को तपती हवा से मुक्त रखने के लिए श्रीधाम के चारों द्वारों पर खस के पर्दे लगाए जाते हैं और यह परंपरा सावन पूर्णिमा तक चलेगी।
भविष्यपुराण, मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, स्कन्दपुराण में इस तिथि का विशेष उल्लेख है। इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं, उनका बड़ा ही श्रेष्ठ फल मिलता है। इस दिन सभी देवताओं व पित्तरों का पूजन किया जाता है। पित्तरों का श्राद्ध कर धर्मघट दान किए जाने का उल्लेख शास्त्रों में है। वैशाख मास भगवान विष्णु को अतिप्रिय है अतः विशेषतः विष्णु जी की पूजा करें।
स्कन्दपुराण के अनुसार, जो मनुष्य अक्षय तृतीया को सूर्योदय काल में प्रातः स्नान करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करके कथा सुनते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं। जो उस दिन मधुसूदन की प्रसन्नता के लिए दान करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म भगवान की आज्ञा से अक्षय फल देता है।
भविष्यपुराण के मध्यमपर्व में कहा गया है वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया में गंगाजी में स्नान करने वाला सब पापों से मुक्त हो जाता है। वैशाख मास की तृतीया स्वाती नक्षत्र और माघ की तृतीया रोहिणीयुक्त हो तथा आश्विन तृतीया वृषराशि से युक्त हो, तो उसमें जो भी दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है। विशेषरूप से इनमें हविष्यान्न एवं मोदक देनेसे अधिक लाभ होता है तथा गुड़ और कर्पूर से युक्त जलदान करने वाले की विद्वान् पुरुष अधिक प्रशंसा करते हैं, वह मनुष्य ब्रह्मलोक में पूजित होता है। यदि बुधवार और श्रवण से युक्त तृतीया हो, तो उसमें स्नान और उपवास करने से अनंत फल प्राप्त होता है।

अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं।
तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया।।
उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै:।
तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव।।
-मदनरत्न

अर्थ : भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठर से कहते हैं, ‛हे राजन, इस तिथि पर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता है; इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहा है। इस तिथि पर भगवान की कृपा दृष्टि पाने एवं पितरों की गति के लिए की गई विधियां अक्षय-अविनाशी होती हैं।’

भविष्य पुराण, ब्राह्मपर्व, अध्याय 21
वैशाखे मासि राजेन्द्र तृतीया चन्दनस्य च।
वारिणा तुष्यते वेधा मोदकैर्भीम एव हि।।
दानात्तु चन्दनस्येह कञ्जजो नात्र संशयः।।
यात्वेषा कुरुशार्दूल वैशाखे मासि वै तिथिः।
तृतीया साऽक्षया लोके गीर्वाणैरभिनन्दिता।।
आगतेयं महाबाहो भूरि चन्द्रं वसुव्रता।
कलधौतं तथान्नं च घृतं चापि विशेषतः।।
यद्यद्दत्तं त्वक्षयं स्यात्तेनेयमक्षया स्मृता।।
यत्किञ्चिद्दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु।
तत्सर्वमक्षयं स्याद्वै तेनेयमक्षया स्मृता।।
योऽस्यां ददाति करकन्वारिबीजसमन्वितान्।
स याति पुरुषो वीर लोकं वै हेममालिनः।।
इत्येषा कथिता वीर तृतीया तिथिरुत्तमा।
यामुपोष्य नरो राजन्नृद्धिं वृद्धिं श्रियं भजेत्।।

अर्थ : वैशाख मास की तृतीया को चन्दन मिश्रित जल तथा मोदक के दान से ब्रह्मा तथा सभी देवता प्रसन्न होते हैं। देवताओं ने वैशाख मास की तृतीया को अक्षय तृतीया कहा है। इस दिन अन्न-वस्त्र-भोजन-सुवर्ण और जल आदि का दान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। इसी तृतीया के दिन जो कुछ भी दान किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है और दान देने वाला सूर्यलोक को प्राप्त करता है। इस तिथि को जो उपवास करता है वह ऋद्धि-वृद्धि और श्री से सम्पन्न हो जाता है।

श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार
बालक कृष्ण नियमित अपने परिवार के व पास-पड़ोस के सभी पुरुषों को, थोड़े बड़े लड़कों को गाय चराने जाते देखते, तो उनका भी मन करता पर मैया यशोदा उन्हें मना कर देती कि अभी तू छोटा है, थोड़ा बड़ा हो जा फिर जाने दूंगी।
एक दिन बलरामजी को गाय चराने जाते देख कर लाला अड़ गए- “दाऊ जाते हैं, तो मैं भी गाय चराने जाऊंगा.. ये क्या बात हुई.. वो बड़े और मैं छोटा?”
मैया ने समझाया कि दाऊ का मुंडन हो चुका है इसलिए वो जा सकते हैं, तुम्हारा मुंडन हो जाएगा तो तुम भी जा सकोगे! लाला को चिंता हुई इतनी सुन्दर लटें रखे या गाय चराने जाएं?
बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने सोचा कि लटें तो फिर से उग जाएंगी, पर गाय चराने का इतना आनंद अब मुझसे दूर नहीं रहना चाहिए।
वे तुरंत नन्दबाबा से बोले- “कल ही मेरा मुंडन करा दो.. मुझे गाय चराने जाना है।”
नंदबाबा हंसे- “ऐसे कैसे करा दें मुंडन.. हमारे लाला के मुंडन में तो बहुत बड़ा आयोजन करेंगे, तब लाला के केश जाएंगे।”
लाला ने अधीरता से कहा- “आपको जो आयोजन करना है, करो पर मुझे गाय चराने जाना है.. आप जल्दी से जल्दी मेरा मुंडन करवाओ।”
अतः नंदबाबा ने गर्गाचार्यजी से लाला के मुंडन का शुभ-मुहूर्त निकलवाने का आग्रह किया। निकट में अक्षय तृतीया का दिन शुभ था, इसलिए उस दिन मुंडन का आयोजन तय हुआ। इसके बाद भव्य आयोजन में मुंडन हुआ और मुंडन होते ही लाला मैया से बोले- “मैया मुझे कलेवा (नाश्ता) दो, गाय चराने जाना है।”
मैया थोड़ी नाराज होते हुए बोली- “इतने मेहमान तुम्हें देखने आए और तुम गर्मी में गाय चराने का हठ कर रहे हो।” लेकिन लल्ला भी अड़ गए- “ऐसा थोड़े होता है.. मैंने तो गाय चराने के लिए ही मुंडन कराया था, नहीं तो इतनी सुन्दर लटों को काटने देता क्या?” फिर, नन्दबाबा सबको छोड़ लल्ला को लेकर निकले। श्रीकृष्ण भी छड़ी, बंसी, कलेवे की पोटली ले पूरी तैयारी से निकले। एक बछिया भी ले ली, जिसे हुर्र.. हुर्र.. कर वो खुश हो रहे कि आखिर वे बड़े हो गए। वैशाख का माह और व्रज की प्रचंड गर्मी, कुछ ही देर में बालक श्रीकृष्ण बेहाल हो गए, पर अपनी जिद के आगे हार कैसे मानते? थोड़ी ही दूर ललिताजी और कुछ अन्य सखियां मिलीं और लल्ला की हालत समझ गईं। उन्होंने नन्दबाबा से कहा कि आप इन्हें हमारे पास छोड़ जाओ, हम कुछ देर बाद नंदालय पहुंचा देंगे। उन्होंने कान्हा को कदम्ब की शीतल छाया में बिठाया और चंदन, खरबूजे के बीज, मिश्री का पका बूरा, इलायची आदि ले आईं। फिर, कान्हा को चन्दन का लेप लगाया और मिश्री, खरबूजे के बीज के लड्डू और इलायची को पीस कर मिश्री के रस में मिला कर शीतल शरबत तैयार कर दिया। कुछ देर आराम बाद ललिताजी उन्हें नंदालय छोड़ आईं।
आज भी अक्षय-तृतीया के दिन प्रभु को ललिताजी के भाव से बीज के लड्डू और इलायची का शीतल शर्बत का भोग लगाकर आरोगाए जाते हैं व विशेष रूप से केशर मिश्रित चन्दन की गोटियां लगाई जाती हैं।

अक्षय तृतीया का महत्व
मां गंगा का धरती अवतरण।
महर्षि परशुराम का जन्म।
मां अन्नपूर्णा का जन्म।
द्रौपदी को चीरहरण से कृष्ण ने बचाया।
श्रीकृष्ण और सुदामा का मिलन।
कुबेर को खजाना मिला।
सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ।
ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण।
श्रीबद्री नारायणजी का कपाट खोले जाते है।
बांकेबिहारी मंदिर में श्रीविग्रह चरण के दर्शन।
महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था।

अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्रारंभ किया जा सकता है।
काशी पत्रिका

Post Author: kashipatrika

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