‛अक्षय’ इंटरव्यू

देश सिर से पांव तक राजनीतिक रंग में सराबोर है। आज काशी में सात राज्यों के सीएम सहित दर्जनों वीआईपी दरबार लगाएंगे, भव्य रोड शो होगा और कल यानी 26 अप्रैल को चुनावी पर्चा भी भर जाएगा। इन सबके बीच यकायक देश के माननीय गैर राजनीतिक क्यों हो गए, वो भी एक अभिनेता के साथ! हमारी समझ से काफी ऊपर के स्तर की बात लग रही है। खैर, ये तो समझ की बात हुए, पर एक नासमझी की चर्चा भी हो जाए, यदि माननीय का मन गैर राजनीतिक हो ही रहा था, तो मौका हमें ही मिल जाता, हम भी थोड़े गैर पत्रकारीय हो लेते और आम से कर ओबामा तक की चर्चा कर लेते। रही बात अक्षय सरीके अभिनय के सामने हमारे शून्य होने की, तो वह भी कोई ऐसी समस्या नहीं थी, जिसका तोड़ न हो! क्योंकि माननीय ने भी अभिनय की कोई शिक्षा नहीं ली है, दूसरे ‛रीटेक’ का फॉर्मूला भी तो है।
बहरहाल, ईर्ष्या ही कहिए, जो मन कभी बेचारे अक्षय को बुरा-भला कह रहा है, तो कभी माननीय के विशाल हृदय को समझने में बौना पड़ जा रहा है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, तेल की बढ़ती कीमतों, महंगाई, आतंक, कश्मीर के हालात… कितनी ही समस्याओं और विपक्ष की कथित ‛चौकीदार चोर है’ की छींटाकशी के बीच ही नहीं, बल्कि काशी में विशाल तामझाम के बीच पर्चा भरने की तैयारी की व्यस्तता में भी माननीय गैर राजनीतिक हो सकते हैं, यहीं तो संन्यास है, जिस पर अक्षय ने भी सवाल पूछा।
फिलहाल, सिर्फ इतना कि अक्षय के पत्रकारिता संभालते ही हम जैसे खाली हुए पत्रकारों के मन में भी संन्यास का ख्याल कुलबुलाने लगा है। सो सोच रहे हैं कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों से खिलाड़ियों-फिल्मी हस्तियों को टिकट मिल गया है, वहां के नेतागण को साथ लेकर संन्यास पर निकल लें, ताकि वहां सभी एकांत में स्वयं से साक्षात्कार कर सकें। अब अपनी बात को जावेद साहब के लिखे गीत के साथ विराम देते हैं-
“ओरे मनवा तू तो बावरा है
तू ही जाने तू क्या सोचता है
बावरे
क्यूं दिखाए सपने तू सोते जागते…”

■ सोनी सिंह

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Post Author: Soni

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