आज योग निद्रा से जागेंगे “श्रीहरि”

तुलसी-शालिग्राम विवाह का दिन “देवोत्थान एकादशी”

आज यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सभी 24 एकादशी में सबसे शुभ और मंगलकारी माना जाता है। इसे देवोत्थान एकादशी, देवउठनी एकादशी,देवप्रबोधिनी एकादशी और डिठवन एकादशी भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है इस दिन भगवान विष्णु जो पिछले 4 महीनों से क्षीर सागर में सोए हुए थे, वह जागते हैं। भगवान के जागते ही 4 महीनों से रूके हुए सभी तरह के मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाएंगे। आज श्रीहरि विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराए जाने की परंपरा है। आइए जानते हैं  कि हिंदू धर्म में तुलसी का महत्व, जन्म और श्रीहरि से विवाह की धार्मिक कथा-

हिंदू धर्म में तुलसी को बेहद पवित्र और पूजनीय माना जाता है। इसके पत्तों का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। तुलसी के पौधे को एंटी-बैक्टीरियल माना गया है, जो अपने आस-पास के वातावरण शुद्ध बनाती है। इसकी वजह से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है, वास्तु के दोष भी दूर होते हैं। स्वास्थ्य के नजरिए से यह बेहद लाभकारी होती हैं।
हिंदू पुराणों के अनुसार तुलसी जी को भगवान श्रीहरि विष्णु का बहुत प्रिय माना जाता है।

कथाओं में “तुलसी” जन्म
प्राचीन समय में एक राजा था धर्मध्वज और उसकी पत्नी माधवी। दोनों गंधमादन पर्वत पर रहते थे। माधवी हमेशा सुंदर उपवन में आनंद किया करती थी। ऐसे ही काफी समय बीत गया और उन्हें इस बात का बिलकुल भी ध्यान नहीं रहा। परंतु कुछ समय पश्चात धर्मध्वज के हृदय में ज्ञान का उदय हुआ और उन्होंने विलास से अलग होने की इच्छा की। दूसरी तरफ माधवी गर्भ से थी। कार्तिक पूर्णिमा के दिन माधवी के गर्भ से एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ। इस कन्या की सुंदरता देख इसका नाम तुलसी रखा गया।

तुलसी विवाह
बालिका तुलसी बचपन से ही श्रीहरि विष्णु की परम भक्त थी। कुछ समय के बाद तुलसी बदरीवन में कठोर तप करने चली गई। वह नारायण को अपना स्वामी बनाना चाहती थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उनसे वर मांगने को कहा, तब तुलसी ने भगवान विष्णु को अपने पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। ब्रह्माजी ने उन्हें मनोवांछित वर दिया।
इसके बाद उनका विवाह शंखचूड से हुआ। शंखचूड एक परम ज्ञानी और शक्तिशाली राजा था। उसने देवताओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। शंखचूड के पास अपनी शक्ति के साथ तुलसी के पतिव्रत धर्म की भी शक्ति थी। देवताओं ने तुलसी का पतिव्रत भंग करने के लिए एक योजना बनाई और उसके सूत्रधार बने श्रीहरि विष्णु जी।
भगवान विष्णु ने माया से शंखचूड का रूप धारण कर तुलसी का पतिव्रत भंग कर दिया। जब देवी तुलसी को इस बात की जानकारी मिली, तो वह बेहद क्रोधित हुईं और उन्होंने विष्णुजी को पाषाण यानि पत्थर का बन जाने का श्राप दिया। तभी से विष्णुजी शालिग्राम के रूप में पूजे जाने लगे। तुलसीजी की उत्पत्ति के विषय में कई अन्य कथाएं भी हैं ,लेकिन समय के साथ बदलने वाली इन कथाओं का मर्म एक ही है।

श्रीहरि की प्राण प्रिय
जब देवी तुलसी ने विष्णुजी को श्राप दिया, तो विष्णुजी ने उनका क्रोध शांत करने के लिए उन्हें वरदान दिया कि देवी तुलसी के केशों से तुलसी वृक्ष उत्पन्न होंगे। जो आने वाले समय में पूजनीय और विष्णुजी को प्रिय माने जाएंगे। श्रीहरि विष्णु की पूजा तुलसी दल का उपयोग किये बिना अधूरी मानी जाती है। साथ ही श्रीहरि ने उन्हें वरदान दिया कि आने वाले युग में लोग खुशी से विष्णुजी के पत्थर स्वरूप और तुलसीजी का विवाह कराएंगे।

तुलसी से जुड़ी मुख्य बातें
* तुलसीजी को सभी पौधों की प्रधान देवी माना जाता है।
* तुलसी के पत्तों के बिना विष्णु जी की पूजा अधूरी होती है।
* पतिव्रता स्त्रियों के लिए तुलसी के पौधे की पूजा करना पुण्यकारी माना जाता है।
* कार्तिक माह में तुलसी विवाह का त्यौहार मनाया जाता है, जिसमें विष्णुजी के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसीजी के साथ कराया जाता है।

तुलसीजी का परिवार
तुलसी की माता का नाम माधवी तथा पिता का नाम धर्मध्वज था। उनका विवाह भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न शंखचूड से हुआ था।

तुलसी जी के अन्य नाम और उनके अर्थ
वृंदा- सभी वनस्पति व वृक्षों की आधि देवी
वृन्दावनी – जिनका उद्भव व्रज में हुआ
विश्वपूजिता- समस्त जगत द्वारा पूजित
विश्व-पावनी – त्रिलोकी को पावन करने वाली
पुष्पसारा – हर पुष्प का सार
नंदिनी – ऋषि मुनियों को आनंद प्रदान करने वाली
कृष्ण-जीवनी- श्रीकृष्ण की प्राण जीवनी
तुलसी – अद्वितीय

आज ऐसे करें तुलसी की पूजा और मंत्र
मान्यतानुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि के दिन जो जातक तुलसीजी की पूजा करता है, उसे कई जन्मों का पुण्य फल प्राप्त होता है।
● इस दिन तुलसी के आसपास साफ-सफाई और पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।

● सुबह स्नान के बाद तुलसी को जल चढ़ाएं। हल्दी, दूध, कुंकुम, चावल, भोग, चुनरी आदि पूजन सामर्गी अर्पित करें।

● सूर्यास्त के बाद तुलसी के पास दीपक जलाएं। कर्पूर जलाकर आरती करें।

● आप चाहें तो इस दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह भी करवा सकते हैं। अगर ये नहीं कर सकते हैं तो तुलसी की सामान्य पूजा भी की जा सकती है।

● घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने के लिए प्रार्थना करें। तुलसी नामाष्टक का पाठ करें।
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
यः पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।।
■ काशी पत्रिका

Post Author: Soni

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