उन के आगे वफा की कीमत क्या!

उठ चले वो तो इस में हैरत क्या,
उन के आगे वफा की कीमत क्या!

उस के कूचे से हो के आया हूँ,
इस से अच्छी है कोई जन्नत क्या!

शहर से वो निकलने वाले हैं,
सर पे टूटेगी फिर कयामत क्या?

तेरे बंदों की बंदगी की है,
ये इबादत नहीं इबादत क्या?

कोई पूछे कि इश्क क्या शय है,
क्या बताएँ कि है मोहब्बत क्या!

आँसुओं से लिखा है खत उनको,
पढ़ वो पाएँगे ये इबारत क्या!

मैं कहीं और दिल लगा लूँगा,
मत करो इश्क इस में हुज्जत क्या!

गर्म बाजार हों जो नफरत के,
इस जमाने में दिल की कीमत क्या?

कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर,
क्या हकीकत है और सियासत क्या!
■ सागर खय्यामी

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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