ग्यानै कारन कर अभ्यासु…

आसन, ध्यान, समाधि सब सीढ़ियां हैं। सीढ़ियों पर ही मत भटक जाना। सीढ़ियां कितनी ही सुंदर हों, लेकिन तुम्हारा लक्ष्य तो मंदिर में प्रवेश करना है, क्योंकि मंदिर का मालिक भीतर विराजमान है…

ग्यानै कारन कर अभ्यासु, ग्यानै भया तहं करमैं नासू।।

योग, ध्यान, तप-सारा अभ्यास, परमात्मा को जान लेने के लिए, उनका अनुभव हो जाए, इसलिए है। इन्हीं में मत उलझ जाना। नहीं तो कुछ लोग जिंदगी इसी में लगा देते हैं कि वे आसन ही साध रहे हैं। मैं ऐसे लोगों को जानता हूं, जो जिंदगी भर से आसन ही साध रहे हैं। भूल ही गए कि आसन अपने आप में व्यर्थ है। ध्यान कब साधोगे? और ध्यान भी अपने आप में काफी नहीं है, समाधि कब साधोगे? और समाधि भी अपने आप में काफी नहीं है। ये सब साधन ही साधन हैं, सीढ़ियां हैं। सीढ़ियों पर मत अटक जाना। सीढ़ियां बहुत प्यारी भी हो सकती हैं, स्वर्ण-मंडित भी हो सकती हैं, उनका भी अपना सुख हो सकता है। लेकिन ध्यान रखना कि सीढ़ियां मंदिर की हैं, प्रवेश मंदिर में करना है। मंदिर का राजा, मंदिर का मालिक भीतर विराजमान है।

सब अभ्यास करो, लेकिन एक ध्यान रहे सब अभ्यास साधन मात्र हैं। ध्यान हो, पूजा हो, आराधना हो, सब अभ्यास हैं और साधन हैं। एक न एक दिन इन्हें छोड़ देना है। कहीं ऐसा न हो कि अभ्यास करते-करते अभ्यास में ही जकड़ जाओ!

ऐसी ही अड़चन हो जाती है। लोग पकड़ लेते हैं फिर अभ्यास को। फिर वे कहते हैं, तीस वर्षों से साधा है, ऐसे कैसे छोड़ दें? तो फिर साधन ही साध्य हो गया। फिर तुम अंधे हो गए। फिर तुम रेलगाड़ी में बैठ गए और यह भूल ही गए कि कहां उतरना है।

मुल्ला नसरुद्दीन सफर कर रहा था। टिकट कलेक्टर ने उससे टिकट पूछा। यह जेब देखी उसने वह जेब देखी, बिस्तर खोला, सूटकेस खोला, सारी चीजें फैला दीं। कलेक्टर भी चिंतित हो गया। उसने कहा रहने दीजिए आप, भले आदमी मालूम होते हैं। जरूर होगी टिकट। उसने कहा कि ऐसी की तैसी टिकट की। तुम्हारे लिए कौन टिकट खोज रहा है!उसने कहा फिर तुम किसके लिए खोज रहे हो? उसने कहा मैं इसलिए खोज रहा हूं कि मुझे जाना कहां है! जाना कहां है, यह याद रखना। कहीं ऐसा न हो कि ट्रेन में ही बैठे रहो, याद भी भूल जाए कि कहां जाना है।

रैदास ठीक कहते हैं: ग्यानै कारन कर अभ्यासु

अभ्यास तो करना- ध्यान का करो, प्रेम का करो, भक्ति का करो, लेकिन स्मरण रहे, लक्ष्य परमात्मा है। इसी में मत अटक जाना!

ग्यान भया तहं करमैं नासू।।

और जैसे ही ज्ञान हो जाएगा, वैसे ही सारा अभ्यास, सारे साधन, सारे कर्म खो जाएंगे। फिर क्या जरूरत रह जाएगी।

■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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