“प्रेम को मेरी आंखों से देखो”

प्रेम का आकाश कितना विस्तृत है तुमने कभी देखने-जानने का प्रयास ही नहीं किया। तुमने तो आंख ही नहीँ उठाई। दूर-दूर तक फैला हुआ आकाश जब तुम्हें समझ नहीं आता, तो भीतर का आकाश क्या समझ आएगा…

प्रेम का पागलपन क्या है? यह प्रेम की मस्ती क्या है? यह तुम कहां सीखोगे? किसी मस्त के पास बैठो। यह जो चारों तरफ सौंदर्य की अनंत वर्षा हो रही है, यह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती। किन्हीं ऐसी आंखों के पास बैठो, जिन्हें यह दिखाई पड़ती है। किन्हीं आंखों का सहारा लो। इसलिए तुमसे बार-बार कहता हूं: कभी-कभी मेरी आंखों से देखो। कभी-कभी मेरे कानों से सुनो। मेरे कानों से सुनोगे तो तुम्हें पता चल जाएगा।

कहां तक प्रेम का आकाश फैला है! कितना विस्तीर्ण है प्रेम का आकाश! तुम तो अपने घर के आंगन से ही न निकले। तुमने तो आंख ही न उठाई। तुम तो चांदत्तारों को देखते ही नहीं। वह जो दूर-दूर तक फैला हुआ आकाश है, वह तुम्हें समझ नहीं आता। बाहर का आकाश समझ नहीं आता; भीतर का आकाश तो क्या समझ आएगा!और कितने दूर तक उड़ सकता है, इसका भी तुम्हें कुछ पता नहीं। तुम तो पंख ही नहीं फड़फड़ाते। तो जो उड़ना जानता हो उसके पास जाओ। तैरना सीखना हो तो तैरने वाले के पास जाओ। पीना सीखना हो तो पियक्कड़ के पास जाओ।

भगत के पास है क्या? संत के पास है क्या? जो है, वह साधारण चमड़े की आंखों से दिखाई भी नहीं पड़ता। वह तो पास रहोगे, रहते-रहते-रहते उसका रस लगेगा; रसायन पकड़ेगी।

जीवंत के पास आओ, ताकि कोई किरण तुम्हें छू ले; तुम्हारे अंधेरे को डगमगा दे; तुम्हारी सदियों से जमी धूल को उखाड़ दे; तुम्हारे पथरीले हो गए, जम गए हृदय को पिघला दे!

■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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