मैं और ‛मैं’ का भेद

जीवन का तनाव और द्वंद्व ‘मैं’ और ‘न-मैं’ के विरोध से पैदा होता है। यही मूल चिंता और दुख है। जो इस द्वंद्व को पार कर लेता है, वह प्रभु में प्रविष्ट हो जाता है…

एक युवक ने पूछा, ”परमात्मा को पाने के लिए मैं क्या करूं?” मैंने कहा, ”’मैं’ को शून्य कर लो या पूर्ण कर लो।’ वह कुछ समझा नहीं और एक कहानी उससे कहनी पड़ी- किसी समय दो फकीरों का मिलन हुआ। उन दोनों के सैकड़ों शिष्य भी उनके साथ थे। और यह भी सर्वविदित था कि उनके विचार बिलकुल विरोधी हैं। पहले फकीर ने दूसरे से पूछा, ”मित्र, जीवन की खोज में क्या तुमने पाया? जहां तक मेरा सवाल है, मैंने तो ‘मैं’ को खो दिया है। वह धीरे-धीरे हारता गया और अब बिलकुल मिट गया है। उसकी अब कोई रेखा भी बाकी नहीं है। ‘मैं’ नहीं, अब तो ‘वही’ बाकी है। सब है- लेकिन ‘मैं’ नहीं हूं। सब ‘उसकी’ ही मर्जी है। और ‘उसकी’ धरा में मात्र बहे जाना- न-कुछ होकर मात्र जीए जाना- कैसा आनंद है! जो पाना था, वह मैंने पा लिया और जो होना था, वह मैं हो गया हूं। ओह! ‘मैं’ के मिट जाने में कितनी शक्ति है, कितनी शांति है और कितना सौंदर्य है।” यह सुनकर दूसरा बोला, ”मित्र मैं तो ‘मैं’ हो गया हूं। मैं ही हूं अब और कुछ नहीं है। सब कुछ मैं ही हूं। ‘मैं’ के बाहर जो है, वह नहीं है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’। चांद और तारे ‘मैं’ ही चलाता हूं, मैं ही सृष्टिं को बनाता और मिटाता हूं। सृष्टि का यह सारा खेल मेरा ही संकल्प है। और, मित्र, ‘ मैं ‘ की इस विजय में कितना आनंद है, कितनी शांति है, कितना सौंदर्य है!”

उन दोनों के शिष्य इन बातों को सुन बहुत हैरानी में पड़ गए। और उस समय तो उनकी उलझन का ठिकाना न रहा, जब बिदा होते वे दोनों फकीर एक दूसरे को बांहों में लेकर कह रहे थे, ”हम दोनों के अनुभव बिलकुल समान हैं। कितने विरोधी मार्गो से चलकर हम एक ही सत्य पर पहुंच गए हैं।”

‘मैं’ शून्य हो, तो पूर्ण हो जाता है। शून्य और पूर्ण एक ही हैं। जो शून्य से चलता है, वह निर्वाण पर पहुंचता है। और, जो पूर्ण से चलता है, वह ब्रह्म पर। लेकिन, निर्वाण और ब्रह्म क्या एक ही अवस्था के दो नाम नहीं हैं!

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

Post Author: Soni

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