मन के दृष्टा

मन को देखो और देखो कि वह कहां है, वह क्या है। तुम अनुभव कर पाओगे कि विचार तैर रहे होंगे और वहां पर अंतराल भी होंगे…

यदि तुम थोड़ी देर देखो, तुम देखोगे अंतराल विचारों से अधिक हैं, क्योंकि प्रत्येक विचार दूसरे विचार से पृथक है; सच तो यह है कि प्रत्येक शब्द दूसरे से पृथक है। जितना तुम गहरे जाओगे, तुम उतने ही अधिक से अधिक अंतराल पाओगे, बड़े से बड़े अंतराल। एक विचार तैरता है और फिर अंतराल आता है जहां कोई विचार नहीं होता; तब फिर एक और विचार आता है, एक और अंतराल उसका अनुसरण करता है।

यदि तुम बेहोश हो तो तुम अंतराल नहीं देख सकते; तुम एक विचार से दूसरे विचार पर छलांग लगाते हो, तुम कभी भी अंतराल नहीं देखते। यदि तुम सचेत होओ तो तुम अधिक से अधिक अंतराल देखोगे। यदि तुम पूरी तरह से सचेत हो जाओ, मीलों लंबे अंतराल तुम पर प्रकट होंगे। और इन अंतरालों में सतोरी घटती है। उन अंतरालों में सत्य तुम्हारे द्वार खटखटाता है।

■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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