दुख बांटने का रस!!

दुखी होने में भी बड़ा रस है; क्योंकि जब तुम दुखी होते हो, तब तुम सहानुभूति मांगते हो। सहानुभूति में बड़ा रस है। इसी लिए तो लोग अपने दुख की कथा एक-दूसरे को बढ़ा-चढ़ा कर सुनाते हैं…

कौन उत्सुक है तुम्हारे दुख में? और, दुख की बातें सुनकर दूसरा भी उदास ही होगा; कोई दूसरे के जीवन में फूल तो नहीं खिल जाएंगे। लेकिन, तुम सुनाए जा रहे हो। और दूसरा तभी तक सुनता है, जब तक उसे आशा रहती है कि तुम भी उसके दुख को सुनोगे। तो यह एक समझौता है- तुम हमें उबाओ, हम तुम्हें उबाएं।
क्या कारण है कि आदमी दुख की इतनी चर्चा करता है? सहानुभूति की अपेक्षा रखता है। दुख की बात करेगा, तो कोई पुचकारेगा, सहलाएगा। दूसरे का प्रेम मांग रहे हो तुम दुख के द्वारा। जब भी तुम दुखी होते हो, तभी तुम्हें थोड़ी-सी आशा चारों तरफ से मिलती है। लोग तुम्हें सहारा देते मालूम पड़ते हैं; सहानुभूति दिखलाते हैं। प्रेम तुम्हें जीवन में मिला नहीं है और सहानुभूति कचरा है; लेकिन प्रेम के लिए वही निकटतम परिपूरक है।
सहानुभूति नकली प्रेम है। आकांक्षा तो प्रेम की थी, लेकिन प्रेम को तो अर्जित करना होता है; क्योंकि प्रेम केवल उसी को मिलता है, जो प्रेम दे सकता है। प्रेम दान का प्रतिफलन है। तुम देने में असमर्थ हो; तुम सिर्फ मांग रहे हो। तुम भिखमंगे हो, तुम सम्राट नहीं !!!
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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