भय क्यों!

भय का जन्म इच्छा की वजह से होता है, जैसे ही किसी इच्छा जन्म भय भी साथ-साथ उत्पन्न हो जाएगा-कहीं यह नहीं हो पाया तो…यानी भय उस इच्छा का बाइ-प्रोडक्ट है…

भय क्या है? पहली बात: भय हमेशा किसी इच्छा के आसपास पनपता है। तुम प्रसिद्ध होना चाहते हो, संसार के सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति होना चाहते हो- फिर भय शुरू होता है। अगर ऐसा न हो सका तो क्या होगा? भय लगता है। भय उस इच्छा का बाइ-प्रोडक्ट है।
तुम संसार के सबसे धनवान व्यक्ति बनना चाहते हो- सफलता न मिली तो क्या होगा? सो भीतर से तुम कांपने लगते हो, भय शुरू हो जाता है। तुम्हारी किसी स्त्री पर मालकियत है; तुम भयभीत होते हो कि हो सकता है कल तुम्हारी उस पर मालकियत न रहे, वह किसी और के पास चली जाए। अगर वह जीवित है तो वह जा सकती है, सिर्फ मुर्दा स्त्रियां कहीं नहीं जातीं। केवल एक लाश पर ही मालकियत की जा सकती है- उसके साथ कोई भय नहीं है। वह हमेशा तुम्हारे पास रहेगी।
फर्नीचर पर तुम कब्जा कर सकते हो, उसके साथ कोई भय नहीं है। लेकिन कौन जानता है? कल वह तुम्हारी नहीं थी, आज तुम्हारी है, कौन जानता है कल वह किसी और की हो जाए? भय लगता है। यह भय मालकियत करने की इच्छा से उठ रहा है, यह एक बाइ-प्रोडक्ट है, क्योंकि तुम कब्जा करना चाहते हो, इसलिए भय है।
अगर तुम कब्जा करना न चाहो, तो फिर कोई भय नहीं है। अगर तुम्हारी ऐसी कोई इच्छा न हो कि भविष्य में तुम यह बनना चाहोगे या वह बनना चाहोगे तो फिर कोई भय नहीं है। अगर तुम स्वर्ग जाना नहीं चाहते, तो कोई भय नहीं होगा, कोई धर्मगुरु तुम्हें डरा न पाएगा। अगर तुम कहीं जाना नहीं चाहते, तो कोई भी तुम्हें डरा नहीं पाएगा।
अगर तुम इसी क्षण में जीने लगो, तो भय मिट जाता है। भय वासना के कारण पैदा होता है। तो मूलतः वासना भय को पैदा करती है। झांको भय में। जब भी भय लगे, तो देखो कि वह कहां से आ रहा है- कौन सी इच्छा, कौन सी वासना उसे निर्मित कर रही है- और फिर उसकी व्यर्थता को देखो।
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *