“नास्तिकता: एक अनिवार्य प्रक्रिया”

आस्तिक होने के लिए नास्तिक होना अत्यंत अनिवार्य है। जिन्होंने कभी नास्तिकता नहीं चखी, वे आस्तिकता का स्वाद न समझ पाएंगे। जैसे ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं सफेद खडि़या से, अक्षर-अक्षर साफ दिखाई पड़ता है। यूं तो सफेद दीवाल पर भी लिख सकते हैं, मगर तब अक्षर दिखाई न पड़ेंगे…

इस जगत के बड़े से बड़े दुर्भाग्यों में से एक है कि हम प्रत्येक बच्चे को नास्तिक बनने के पहले आस्तिक बना देते हैं। वह आस्तिकता झूठी होती है, उसमें कुछ प्राण नहीं होते।
सिखाई नास्तिकता उतनी ही थोथी होगी, जितनी सिखाई आस्तिकता। किसी बच्चे को भूख तो नहीं सिखानी होती, प्यास तो नहीं सिखानी होती, नींद तो नहीं सिखानी होती। नास्तिकता वैसी ही स्वभावत: पैदा होती है। नास्तिकता का ठीक अर्थ है: जिज्ञासा, आकांक्षा जानने की, अन्वेषण, खोज। वह यात्रा है। प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ लेकर आया है उसके बीज। किसी को नास्तिक बनाने की जरूरत नहीं है और न किसी को आस्तिक बनाने की जरूरत है। बनाया कि चूक हुई।
जीवन प्रामाणिक होना चाहिए। हमें इतना धैर्य रखना चाहिए कि बच्चे पर जब जिज्ञासा अपने आप अवतरित होगी, जब वह पूछेगा, तो हम साथ देंगे। और साथ भी बहुत सोच कर देना।
साथ देने का अर्थ नहीं है कि वह पूछे और तुम उत्तर देना। प्रश्न उसका, उत्तर तुम्हारा, मेल कैसे होगा? प्रश्न उसका तो उत्तर भी उसका ही होना चाहिए, तभी तृपित होगी, तभी संतोष होगा, तभी बोध होगा, बुद्धत्व होगा। तो जब बच्चे को जिज्ञासा जगे, प्रश्न उठें, संदेह के झंझावात आएं, तब माता को, पिता को, परिवार को, प्रियजनों को, शिक्षकों को सहयोग देना चाहिए- प्रश्नों के निखारने का, निखारने में, प्रश्नों पर धार रखने में। प्रश्नों पर उत्तर नहीं थोपने हैं, प्रश्नों को त्वरा देनी है, तीव्रता देनी है। प्रश्नों को ऐसी प्रगाढ़ता देनी है कि जब तक व्यक्ति उनके उत्तर स्वयं न खोज ले, चैन न पाए, विश्राम न पाए। उसके प्रश्नों को मूल्य दो।
झूठे हैं। भारत में आस्तिकता थोपी जाती है, चीन और रूस में नास्तिकता थोपी जाती है। हर थोपी चीज झूठी हो जाती है। जिसके भीतर से नास्तिकता जगी है! और हर बच्चे के भीतर जगती है, जगनी ही चाहिए। मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। मनोवैज्ञानिक अनिवार्यता है।
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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