“पूरब और पश्चिम का मेल हो”

मनुष्य न तो पूर्वी हो और न पश्चिमी, क्योंकि यह कुरूप होगा। सारी पृथ्वी हमारी है और हम सारी पृथ्वी के हैं। मनुष्य को बस मनुष्य होना चाहिए, बस एक समग्र, अखंड मानव…

मनुष्य को आंतरिक और बाह्य दोनों रूप से समृद्ध होना चाहिए, यानी वह न बहिर्मुखी और न ही अंतर्मुखी। मनुष्य आंतरिक और बाह्य दोनों को संतुलित कर लेता है, तो यह महानतम हर्ष का अनुभव देता है। ऐसा व्यक्ति जो कि न तो अंदर की ओर बहुत अधिक झुक रहा है, न ही बहुत अधिक बाहर कि ओर, एक संतुलित व्यक्ति है। वह एक साथ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक होगा। ऐसा ही कुछ होगा, ऐसा ही कुछ होने वाला है। मैं एक ऐसा मनुष्य देखना पसंद करूंगा, जो न तो पूर्वीय हो और न ही पश्चिमी, क्योंकि पश्चिमी के विरोध में पूर्वीय होना कुरूप है। पूर्वीय के विरोध में पश्चिमी होना भी कुरूप है। सारी पृथ्वी हमारी है और हम सारी पृथ्वी के हैं। मनुष्य को बस मनुष्य होना चाहिए, मनुष्य को बस एक मानव होना चाहिए, समग्र, अखंड। और उस अखंडता के फलस्वरूप एक नवीन स्वास्थ्य का उदय होगा।
पूरब ने दुख उठाया, पश्चिम ने दुख उठाया। पूरब ने दुख उठाया; तुम इसे चारों ओर देख सकते हो, गरीबी, भुखमरी। पश्चिम ने दुख उठाया, तुम पश्चिमी मन के अंदर देख सकते हो, तनाव, चिंता, पीड़ा। पश्चिम आंतरिक रूप से बहुत गरीब है, पूरब बाहरी रूप से बहुत गरीब है। गरीबी बुरी है। फिर चाहे वह बाहर की हो या भीतर की इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता, गरीबी को नहीं आने देना है।
जरा उस मनुष्य की कल्पना करो जो अल्बर्ट आइंस्टीन और गौतम बुद्ध दोनों है। इस संभावना पर विचार करो, यह संभव है। वास्तव में अगर अल्बर्ट आइंस्टीन कुछ और जिया होता, तो वह एक रहस्यवादी बन गया होता। उसने अंदर के विषय में सोचना आरंभ कर दिया था। वह अंदर के रहस्य के बारे में रुचि ले रहा था। तुम बाहरी रहस्य में कितनी देर रुचि ले सकते हो? अगर तुम वास्तव में रहस्य में रुचि रखते हो, तो देर-सबेर तुम आन्तरिकता की ओर भी आओगे।
मेरी अवधारणा एक ऐसे जगत की है, जो न तो पूर्वीय है और न ही पश्चिमी, न आंतरिक और न बाह्य, न अंतर्मुखी न बहिर्मुखी, जो संतुलित है, जो अखंड है।
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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