बदला ना अपने आपको जो थे वही रहे

बदला ना अपने आपको जो थे वही रहे,
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे।

दुनिया ना जीत पाओ तो हारो ना खुद को तुम,
थोड़ी बहुत तो जहान में नाराजगी रहे।

अपनी तरहा सभी को किसी की तलाश थी,
हम जिसके भी करीब रहे दूर ही रहे।

गुजरो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो,
जिसमें खिले है फूल वो डाली हरी रहे।
■ निदा फाजली

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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