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“मोक्ष” मांग रही मोक्षदायिनी

युग-युगांतर से देव-दानव-मानव सभी को मातृत्व भाव से वात्सल्य लुटाने वाली मां गंगा घोर कलियुग में अपनी ही संतति से त्रस्त हैं। समस्त प्राणियों के पापों का नाश कर उन्हें पुण्यदान करने वाली भागीरथी आज मुक्ति मांग रही हैं। आत्मा-परमात्मा का मिलन कराकर लोक-परलोक संवारने वाली मोक्षदायिनी आज खुद के लिए “मोक्ष” मांग रहीं हैं। ..और हम, जो उन्हें ‘मइया’ कहकर अपने पापों से मुक्ति का वचन मांगते हैं, उन्हें निर्बाध रूप से कलुषित किए जा रहे हैं। क्या हम उनकी संतान कहलाने योग्य हैं? अगर हां, तो संकल्प लीजिए गंगा मइया को हमारे पापों से मुक्त कर स्वच्छ और निर्मल बनाने का। 

भागीरथी ‘गंगा’ की स्थिति “जाहि विधि राखे राम..” जैसी  

गंगा हमारी ‘मइया’ हैं, इस पर उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी मुहर लगा दी। अदालत ने गंगा को ‘लिविंग पर्सन’ यानी एक जीवित वास्तविकता घोषित कर हम सबकी माता मान लिया है। लेकिन क्या हम अपनी गंगा मां को प्रसन्न रख पा रहे हैं, यह बड़ा यक्ष प्रश्न हमें ईश्वर रूपी प्रकृति के कठघरे में खड़ा कर रहा है। अपना पाप धोते-धोते हमने ‘मइया’ को इतना मैला कर दिया कि वह हमसे ही पनाह मांगने लगीं। अपने दर्शन से ही पुण्य प्रदान करने वाली हमें दुर्गंध देने लगीं। क्या ऐसी भी संतानें होतीं हैं, जो मां से उसकी निर्मलता छीन लें। हालांकि, पिछले तीन दशक से गंगा संरक्षण की सुगबुगाहट अब प्रखर हो रही है, लेकिन अभी भी आस दूर की ही कौड़ी है। 
सुस्त चाल से “स्वच्छ गंगा” ! 

स्वच्छ गंगा मिशन का ज्यादातर पैसा आवंटित है, लेकिन खर्च नहीं हुआ है। गंगा स्वच्छता के लिए सरकार ने 3.06 अरब डॉलर की निधि बनाई है, लेकिन अप्रैल

2015 से मार्च 2017 तक सिर्फ 20.5 करोड़ डॉलर ही खर्च हुए हैं। मिशन से जुड़े अधिकारी भी मानते हैं  कि अभी तक यूपी में कई जगहों पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कमिशन नहीं हुए हैं। गंगा किनारे बसे शहरों में अब तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स के लिए जमीन नहीं मिल पाई। इससे अगले दशक तक भी स्थिति में सुधार बेहद मुश्किल है।

 
बहुत कठिन है डगर ‘गंगा’ की
माना जा रहा है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बन भी गया, तो गंगा में सीवर जाने से रोक पाना मुश्किल है। वजह बनारस के सीवर एसटीपी की क्षमता से कई गुना हैं। इस समय 100 एमएलडी सीवर का शोधन हो रहा है, जबकि 300 एमएलडी से ज्यादा सीवर गंगा में जा रहा है। गोइठा, दीनापुर, रमना आदि में एसटीपी निर्माणाधीन हैं, जिनसे 260 एमएलडी सीवेज का शोधन और हो पाएगा, फिर भी 60 एमएलडी सीवेज गंगा में गिरेगा और शहरी विकास व विस्तार से सीवेज में भी बढ़ोतरी तय है।
रूठ रहीं हैं ‘निर्मल’ गंगा 

बनारस के अलावा अन्य जगहों का गंगाजल भी और गंंदा हुआ है। यूपी में 456 ऐसे उद्योग हैं, जो गंगा को दूषित कर रहे हैं। लेकिन अब तक इनमें से सिर्फ 14 को

बंद किया गया है। योजना के तहत 182 घाटों का पुन: उद्धार करना था, लेकिन सिर्फ 50 पर ही काम शुरू है, वहीं 118 श्मशानों में सिर्फ 15 को आधुनिक बनाया गया है। काशी में घाटों से गंगा की दूरी भी बढ़ रही है। जलस्तर में गिरावट इसकी बानगी है। एक साल में गंगा का जलस्तर लगभग 20 सेंटीमीटर तक घटा है। 29 जून 2017 को न्यूनतम जलस्तर 58.27 मीटर दर्ज किया गया था, जबकि इस साल अप्रैल के तीसरे हफ्ते में यह 58.11 मीटर ही था।

एक और ‘भगीरथ प्रयास’ की आस
केंद्र की योजना ‘नमामि गंगे’ के तहत यूपी के 25 जिलों से गुजरने वाली गंगा को निर्मल बनाने के लिए उक्त सभी जिलों में 100-100 होमगार्डो की नियुक्ति हो रही है और नाम दिया जा रहा है “गंगा सुरक्षा स्वयंसेवी बल”। यह जवान जिला प्रशासन की मदद से पूरे जिले में गंगा सफाई जागरूकता अभियान चलाएंगे। गंगा में गिरने वाले औद्योगिक/रासायनिक कचरे, नाले-नालियों की गंदगी संबंधी जानकारी विभागीय अधिकारियों को देकर इन्हें बंद कराएंगे। इन्हें अत्याधुनिक मोटर बोट मुहैया कराने के साथ तैराकी भी सिखाई जाएगी, ताकि बाढ़ या किसी आपदा में इनकी मदद ली जा सके। गंगा तटों को शौच मुक्त कराने की जिम्मेदारी भी इन पर होगी, जिसे ये सामाजिक संगठनों की मदद से बतौर जागरूकता पूरा करेंगे।
 
फिर हठी हुए ‘गंगापुत्र’ 
आईआईटी, कानपुर केे प्रोफेसर रह चुके स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने एक बार फिर गंगा को बचाने का हठ पकड़ा है। इस बार उन्होंने पीएम मोदी को चिट्ठी लिख गंगा

दशहरा के बाद देह त्यागने की प्रतिज्ञा ली है। उन्होंने कहा है कि यदि गंगा की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो वह हरिद्वार में 22 जून से आमरण अनशन शुरू कर देंगे। करीब 85 वर्ष के इसी बुजुर्ग ‘गंगापुत्र’ के प्रयासों ने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिलाया। साल 2012 में उनके 60 दिनी अनशन के बाद गंगा के लिए नेेेशनल अथॉरिटी बनाई गई।

 
‘तुम मुझे मुक्ति दो, मैं तुम्हें मोक्ष दूंगी’ 
साल-दर-साल, दशक-दर-दशक समयचक्र चलता रहा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी पापमुक्त होती रही। मां गंगा ने समान रूप से बिना भेदभाव सभी को मोक्ष की राह दिखाई। लेकिन, उनसे अपने पूर्वजों की मुक्ति मांगने वाले उन्हें जीवन पर्यंत मल-मूत्र से नहलाते रहे। बिना सिसकी मइया सिकुड़ती गईं, सिमटती गईं, बीमार पड़ती गईं, मलिन होती गईं। अब, जब उनके पास गए तो मानो उनकी आह निकली और महसूस हुआ जैसे कह रहीं हों, ‘तुम मुझे मुक्ति दो, मैं तुम्हें मोक्ष दूंगी’। मुक्ति अपनी गंदगी से, अपने कल-कारखानों के विष से, अपने जैविक पापों से..।
 कृष्णस्वरूप

Post Author: KrishnaSwarup

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