माँझी मल्हार- ६

ईसा की छठी शताब्दी पूर्व ‘धार्यते इति धर्मः’ के उदार विचार को मानने वाले सनातन धर्म का स्थान वाह्य आडंबरो और अतिरेक कर्म-कांडो ने ले लिया। धर्म की पवित्र ज्योति जो हमेशा लोगों को दिशा दिखाती आई थी, वो धूमिल पड़ने लगी। ठीक इसी समय हिमालय की पहाड़ियों की तलहटी लुम्बिनी में शाक्य कुल के राजा शुद्दोधन और रानी महामाया को एक पुत्र हुआ। कहते हैं जन्म के तुरंत बाद ही बालक कमल पुष्प पर खड़ा हो गया और नन्द और उपनन्द नामक दो दैवीय नाग राजाओं ने उसे स्नान करवाया। बालक के जन्म के साथ ही लोगों की सभी इच्छाएँ सिद्ध हो गई, तो इस निमित्त उसका नाम ‘सिद्धार्थ’ रखा गया। बालक का लालन-पालन उसकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया। बालक धीरे-धीरे बड़ा होने लगा तो सोलह वर्ष की अल्पायु में ही उसका विवाह यशोधरा नामक युवती से किया गया।

 

सिद्धार्थ ने सत्य की खोज में धन-वैभव छोड़कर 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग दिया। पुरखे बताते हैं कि 6 वर्ष की कठिन तपस्या के पश्चात् सिद्धार्थ को बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ और वो बुद्ध कहलाए।

 

इधर काशी भी ज्ञान के विस्तार में अपने चरमोत्कर्ष पर थी, तो बुद्ध ने काशी आने का ही निश्चय किया। बुद्ध जब ऋषिपत्तन(सारनाथ) पहुंचे, तो यहाँ उन्होंने अपने पांच साथियों को देखा, जो उनके साथ ज्ञान की खोज में भटक रहे थे। इन पांच भद्रवर्गीय भिक्षुओं को बुद्ध ने ‘मध्यम मार्ग’ का प्रथम उपदेश दिया। इतिहास में यह घटना ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ के नाम से विख्यात हैं। बुद्ध ने चार आर्य(श्रेष्ठ) सत्यों को प्रतिपादित किया।

 

बुद्ध के अनुसार मानव जीवन दुखों से परिपूर्ण है। प्रथम आर्य सत्य में बुद्ध ने यह बताया है कि संसार में सभी वस्तुए दु:खमय हैं। उन्होंने जन्म और मरण के चक्र को दुखों का मूल कारण माना और बताया कि किसी भी धर्म का मूल उद्देश्य मानव को इस जन्म और मृत्यु के चक्र से छुटकारा दिलाना होना चाहिए। दूसरे आर्य सत्य में बुद्ध ने दुख उत्पन्न होने के अनेक कारण बताए और इन सभी कारणों को तृष्णा बताया। तीसरे आर्य सत्य के अनुसार दु:ख निरोध के लिए तृष्णा का उन्मूलन आवश्यक है। संसार में प्रिय लगने वाली वस्तुओं की इच्छा को त्यागना ही दु:ख निरोध के मार्ग की ओर ले जाता है। चौथे आर्य सत्य में बुद्ध ने दु:ख निरोध के मार्ग को बताया है। यहा बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग को इस हेतु उपयुक्त बताया है।

 

समय के साथ बुद्ध के मध्यम मार्ग का विस्तार केवल भारत तक ही सिमित नहीं रहा, वरन यह विश्व के कई और दूसरे देशों में फैल गया। जैसे काशी किनारे गंगा का प्रवाह शाश्वत है, ठीक उसी प्रकार बुद्ध के उपदेश यहां आज भी प्रवाहित हैं।

Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

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