माँझी मल्हार -२

Varanasi

ब्रह्माण्ड के समान हम काशी का निर्माण कर रहे थे। सभी ऊर्जा श्रोतों का निर्माण ठीक वैसा ही हो रहा था, जिससे स्वयं में पूर्ण एक शक्ति पुंज के समान शहर का निर्माण हो सके। हमने नगर को वृत्ताकार रूप में पांच कोस की चौहद्दी में बनाना प्रारम्भ किया। ये पांच कोस पंचतत्वों के समान सिद्ध हो, इसलिए हमने ऊर्जा श्रोत के रूप में नाड़ियों की संख्या के बराबर 72,000 मंदिरों का निर्माण किया। मूल मंदिरों में 54 शिव के और 54 शक्ति या देवी के बनाए गए। वर्ष की गणना कर हमने सर्वप्रथम 468 मुख्य मंदिरों का निर्माण किया। इस निर्माण में हमने जीवित ऊर्जा को साधने के लिए शहर के ठीक बीच में महाश्मशान ‘मर्णिकर्णिका’ का निर्माण किया; जहां बैठकर साधक मृत देह छोड़कर निकल रही ऊर्जा को साध सके। इसी बीच, हमारे आराध्य देवाधिदेव महादेव विवाह के परिणय सूत्र में बंध कर पूर्णता को प्राप्त हुए। उन्होंने विवाहोपरांत काशी को अपने निवास स्थल के रूप में चुना। माता पार्वती और शिव के निवास करने से यह नगर ‘आनन्दकानन’ कहा जाने लगा। एक साथ जब हमारे बनाए मंदिरों में पूजा प्रारम्भ होती, तो पूरे नगर के वातावरण में एक अद्भुत ऊर्जा उत्पन्न होती। साथ ही महादेव और शक्ति के यहाँ निवास करने से इस नगर की ख्याति स्वर्ग तक हो गई।

 

मैंने अपने पुरखों से कई बार हमारी विरासत के बारे में सुना और जीवनपर्यन्त उसे जिया है। आज भी मैं; इसे समझने का प्रयास कर रहा हूँ और अपनी आने वाली पीढ़ी को इस विरासत से अवगत करवा रहा हूँ।

 

‘एक बार पृथ्वी पाप और पाखण्ड से भर उठी। पाप इतना बढ़ गया कि पृथ्वी के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा। ऐसे में, धर्मपरायण एक राजा हुए देवोदास। देवताओं ने ये जानकार कि अब पृथ्वी के नाश का काल आ गया है देवोदास से आग्रह किया कि वो पृथ्वी पर स्थित ऊर्जा के एकमात्र श्रोत काशी में शासन करें और पुनः धर्म की सत्ता स्थापित करे। लेकिन देवोदास ने एक शर्त रख दी – ‘मैं राजा तभी बनूँगा, जब शिव काशी छोड़ कर चले जाएं। अगर शिव यहीं रहते हैं, तो मेरे राजा बनने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि लोग शिव के ही पास जाएंगे।’ इस पर शिव पार्वती के साथ मंदार पर्वत पर रहने चले गए। देवोदास ने शिव के जाने के बाद शासन करना प्रारम्भ किया और जल्द ही पृथ्वी पाप और पाखण्ड से उबरने लगी। धीरे-धीरे पुनः धर्म का शासन स्थापित हो गया।

 

इन सब के बीच शिव अपनी प्यारी नगरी काशी का मोह नहीं छोड़ सके और व्यथित रहने लगे। उन्होंने काशी पुनः आने की इच्छा जाहिर की, पर इसके आड़े देवोदास की शर्त आ रही थी। तो शिव ने नगर से देवोदास को बाहर निकालने के लिए सर्वप्रथम 64 योगनियों को भेजा। वो यहाँ आई जरूर, पर अपने कार्य को भूल कर नगर की अद्भुत ऊर्जा से इस प्रकार मोहित हुई कि फिर वापस न लौट सकीं। इसके बाद शिव ने 12 आदित्यों को भेजा। पर वह भी नगर की ऊर्जा से ऐसे सम्मोहित हुए कि फिर वापस न लौट सके। आज भी नगर में 64 योगनियों और 12 आदित्यों के स्थान निहित हैं।

 

उसके बाद शिव ने ब्रह्मा को भेजा। ब्रह्मा खुद आये और उन्हें भी यह जगह पसंद आ गयी, और वे वापस नहीं गए। तब शिव ने कहा – ‘मैं इनमें से किसी पर विश्वास नहीं कर सकता’ और फिर शिव ने अपने गणों को भेजा। वे शिव को कभी भूल नहीं सकते, क्योंकि वे शिव के अत्यंत प्रिय हैं। मगर बेचारे गण भी काशी की ऊर्जा से ऐसे मोहित हुए कि फिर वापस न लौट सके। हाँ; उन्होंने इतना जरूर कहा कि एक न एक दिन शिव यहाँ जरूर आएँगे, तो हम उनकी अगवानी करेंगे और नगर के द्वारपाल बन गए।

 

इसके बाद एक-एक कर देवता आते गए और यही बसने लगे। अंततः शिव के पुत्र गणेश और भगवान विष्णु ने देवोदास की शर्त को भेदा और स्वयं देवोदास ने भगवान शिव का आह्वान कर उन्हें यहाँ पुनः आने का आग्रह किया। इस प्रकार कई सदियों तक शिव के विछोह को सहते हुए काशी पुनः एक बार उनके आने से सम्पूर्ण हो गई। नगर में फिर वही आनंद धारा प्रवाहित हो गई, जो धर्मपरायण देवोदास के तप से और भी बढ़ गई थी’।

Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

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