माँझी मल्हार- १

Kashi

जीवनदायिनी गंगा के सतत प्रवाह से प्रस्फुटित सम्पूर्ण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की नगरी काशी; चिरकाल से ही जीवन के उन आयामों को जीती आई है, जिसने देश को सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दिशा दिखाई। कभी इसने जीवन को विस्तार देने के क्रम में भगवान विष्णु की आराधना करते हुए अपने कण-कण को रचनात्मक अथाह आकाश के नीले रंग में रंग लिया, और वैष्णव संप्रदाय का गढ़ बन बैठी। तो जब कभी समाज भोग-विलास के अथाह सागर में डूबने को हुआ, तो इसने मोह-माया त्यागकर देवाधिदेव महादेव को प्रिय चिताभस्म को ही अपना लिया। एक ओर धार्मिक कर्मकांड और आडम्बर और दूसरी ओर वैराग्य बढ़ा, तो इसने महात्मा बुद्ध को अपनाकर जीवन के शास्वत स्वरुप ‘मध्यम मार्ग’ की दिशा दिखाई। ये काशी ही थी, जिसने हर समय और काल में भारत की मूल अवधारणा ‘चरैवेति-चरैवेति’ की जड़ों को सदैव सिंचित और पोषित किया हैं।

पुरखों से काशी के तट पर रहते हुए मैंने इसके इन बदलावों को देखा और संकलित किया हैं, ये संकलन ही मेरी थाती हैं।

‘भगीरथ अपने अथक प्रयास, साधना और तप के बल पर गंगा को साथ लिए काशी की ओर चले आ रहे थे। सम्पूर्ण काशी गंगा में जलमग्न होने को आशंकित थी। भय था कि त्रिपथगा शिव की जटाओं में फंसकर हुए अपने मान मर्दन का प्रतिशोध उनकी प्रिय नगरी काशी को अपने जल में बहाकर लेगी। वेग भी ऐसा कि उसके सामने सागर भी अविचल दिखाई पड़ता। प्रयाग में यमुना और सरस्वती के संयोग से गंगा और भी भयावह गति से अठखेलियां करते भगीरथ के पीछे चली आ रही थी। काशी के लिए जलप्रलय निश्चित जान मेरे आराधय शिव ने शूलटंकेश्वर में अपना त्रिशूल गाड़ गंगा के प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया। तीनों लोकों से प्यारी उनकी काशी को वो किसी भी कीमत पर मिटते नहीं देख पाए।

भगीरथ अपने पुरखों की आत्मा के मोक्ष को लेकर पुनः सशंकित हो गए। एक ओर गंगा का तीव्र वेग और दूसरी ओर शिव का त्रिशूल और उनकी प्रिय काशी। समझाते भी किसे? दोनों अपने मद में मतवाले और बल में पूर्ण थे। हारकर भगीरथ ने शूलटंकेश्वर में शिव की आराधना शुरू की। शिव प्रकट हुए और कहा, “भगीरथ, मैं गंगा द्वारा तीन शर्तों के पूर्ण होने की स्थिति में ही अपना यह त्रिशूल हटाऊँगा। मेरी पहली शर्त है कि त्रिपथगा मेरी काशी में कभी भी तीव्र वेग से नहीं बहेगी। गंगा शांत हो गई और मंद वेग से बहने लगी। दूसरी शर्त यह कि एक बार प्रवेश करने के पश्चात् गंगा कभी भी काशी के घाटों को छोड़ नहीं पाएगी। गंगा ने मंद गति से बहते हुए कुछ इस तरह का कटान किया कि वो काशी में चिरकाल तक अर्धचन्द्राकार रूप में बहती रहे और इसके घाटों को कभी न छोड़े।”

भोलेभंडारी इतने पर भी आश्वस्त नहीं हुए और उन्होंने अपनी तीसरी शर्त रखी, “भगीरथ मुझे संदेह हैं कि गंगा मेरे नगर वासियों को अपने अंदर रहने वाले जीव-जंतुओं से कष्ट दे सकती हैं। तो मेरी तीसरी शर्त यही हैं कि गंगा में पाए जाने वाले जीव-जन्तु मेरी नगरी में कभी किसी को कष्ट नहीं देंगे।” गंगा ने शिव के तीनों प्रस्तावों को मान लिया और स्वयं प्रफुल्लित हो काशी के दर्शन को आगे बढ़ी, जिसे बचाने के लिए शिव स्वयं त्रिशूल गाड़े खड़े थे। वो भी चकित थी कि काशी में आखिर ऐसा क्या है, जो इसे तीनों लोकों से न्यारा बनाता है! गंगा काशी में प्रवेश करते आनंदित हो उठी और उसने यहाँ सदैव मोक्ष के वरदान को पोषित किया।’

■ काशी पत्रिका

Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

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