महादेव की महाशिवरात्रि

कहते हैं काशी के कण-कण में शिव हैं, ऐसे में यदि देवाधिदेव महादेव के भक्तों को इस साल महाशिवरात्रि के मौके पर बाबा विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति न भी हो, तो भी भोलेनाथ श्रद्धालुओं के अंगसंग हैं। यूं भी शिव के लिए समूचा संसार ही शिवालय है, ऐसे में उनकी प्रिय नगरी काशी का क्या कहना! तो चलिए, आज महाशिवरात्रि के मौके पर शिव की काशी और काशी के शिव को लेकर ही ‘हर हर महादेव’ कर लें…

इस बार प्रशासन ने प्रोटोकॉल के तहत भारी भीड़ होने की संभावना को देखते हुए श्रद्धालुओं को स्पर्श दर्शन के लिए गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी है, हालांकि वे विशेष दूरी बनाते हुए गर्भगृह के चारों दरवाजों से दर्शन और प्रार्थना कर सकेंगे। यूं भी काशी शिवालयों की नगरी है, जहां घर-घर में शिवलिंग और कण-कण में शिव हैं। काशी के महापर्व महाशिवरात्रि पर दर्शन-पूजन और जलाभिषेक के साथ जगह-जगह शिवबारात निकलती है और शिव-पार्वती के विवाह समारोह में समूचा नगर डूबा रहता है। इस बार महाशिवरात्रि पर शिव बारातों में कोरोना से लड़ाई, राममंदिर निर्माण, भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तनाव आदि विभिन्न सामाजिक-सामरिक मुद्दों पर झांकियां निकाली जाएंगी। दारानगर से निकालने वाली मुख्य बारात के अलावा तिलभांडेश्वर महादेव, गायघाट, नईबस्ती, लक्सा, रोहनिया, त्रिलोचन महादेव, बटुकभैरव, शिवपुर, चांदपुर समेत कई जगहों पर शिवभक्त बारात लेकर बाबा भोलेनाथ के विवाह के साक्षी बनेंगे।
सृष्टि की साक्षी महाशिवरात्रि
साल की 12 शिवरात्रियों में महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। माघ माह की कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाने के पीछे मान्यता है कि इसी दिन से सृष्टि का प्रारंभ हुआ था। पुराणों के अनुसार इसी दिन अग्निलिंग (महादेव के विशाल स्वरूप) के उदय से सृष्टि की रचना हुई। इस रात ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य भीतर ऊर्जा का प्राकृतिक रूप से ऊपर की और जाती है। यह ऐसा दिन है, जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद करती है। इस समय का उपयोग करने के लिए, इस परंपरा में, हम एक उत्सव मनाते हैं, जो पूरी रात चलता है। इसी दिन शिव-पार्वती का विवाह हुआ। इसीलिए इस दिन को सर्वाधिक महत्व दिया गया और यह परंपरा अनादिकाल से अनवरत है। महाशिवरात्रि पर काशी में भोर से ही गंगास्नान के साथ शिवालयों में श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है और भोलेनाथ को गंगाजल एवं दुग्ध से स्नान कराया जाता है। बेल पत्र, शहद, सिंदूर, धतूरे आदि से लेपन एवं शृंगार कर शिव का अभिषेक किया जाता है। इसमें बेल-पत्र आत्मा की शुद्धि, सिंदूर पुण्य, फल दीर्घायु एवं संतुष्टि, धान्य उपज, दीपक ज्ञान प्राप्ति एवं पान के पत्ते सांसारिक सुख एवं संतोष का प्रतिनिधित्व करते हैं।


महायोगी आध्यात्मिक शिव
महादेव शिव को महायोगी और अध्यात्म का जनक माना गया है, भस्म में धुनि रमाए देवाधिदेव जैसा दूजा कोई नहीं। इसीलिए महाशिवरात्रि आध्यात्मिक एवं यौगिक महत्व भी रखती है। साधकों के लिए यह एकात्म होने एवं कैलाश की भांति स्थिर एवं निश्छल होने का दिन है, तो यौगिक परंपरा में शिव आदिगुरु हैं। ध्यान की अनेक सहस्राब्दियों के उपरांत महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पूर्णरूप से स्थिर हो गए, उनके भीतर की सारी उथल-पुथल शांत हो गई। ‘योगी’ से आशय स्वयं के अस्तित्व की एकात्मकता को जान लेना है। महाशिवारात्रि व्यक्ति को इसी का अनुभव पाने का अवसर देती है। वहीं, सांसारिक जीवन में लोग इस दिन शिव के द्वारा शत्रुओं पर विजय पाने की कामना से पर्व मनाते हैं।


शिव की अर्द्ध परिक्रमा क्यों ️
शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र के अनुसार शिव की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है, अत: उसे लांघना वर्जित है, क्योंकि इससे 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है, लेकिन ‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए। शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर पूरी की जाती है।


शिवजी से जुड़े रोचक तथ्य
🔸भगवान शिव का कोई माता-पिता नहीं है, उन्हें अनादि माना गया है, जो हमेशा से था, जिसके जन्म की कोई तिथि नहीं।
🔹किसी भी देवी-देवता की टूटी मूर्ति नहीं पूजी जाती, लेकिन शिवलिंग चाहे कितना भी टूट जाए, फिर भी पूजा जाता है।
🔸शिवजी की एक बहन भी थी अमावरी, जिसे माता पार्वती की जिद्द पर खुद महादेव ने अपनी माया से बनाया था।
🔹भोले बाबा ने तांडव करने के बाद सनकादि के लिए 14 बार डमरू बजाया, जिससे माहेश्वर सूत्र यानि संस्कृत व्याकरण का प्राकट्य हुआ।
🔸शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने के लिए भी खास प्रावधान है कि जल के बेलपत्र नहीं चढ़ाया जाना चाहिए।
🔹शिवलिंग पर कभी भी शंख से जल नहीं चढ़ाते, क्योकिं शिवजी ने शंखचूड़ को अपने त्रिशूल से भस्म कर दिया था। शंखचूड़ की हड्डियों से ही शंख बना।
🔸महादेव के गले में लिपटा सर्प वासुकि है, जो शेषनाग के बाद नागों का दूसरा राजा था। शिवजी ने प्रसन्न हो इसे गले में डालने का वरदान दिया था।
🔹शिव के वाहन नंदी असल में शिलाद ऋषि को वरदान में प्राप्त पुत्र थे, जो बाद में कठोर तप के कारण नंदी बने और शिवगणों में श्रेष्ठ हुए।
🔸भगवान शिव सृष्टि के सर्जक भी हैं और संहारक भी, इसलिए देव-दानव-मानव सभी श्रद्धालु प्रार्थना करते हैं कि महादेव अपनी तीसरी आंख बंद ही रखें।
काशी पत्रिका

Post Author: kashipatrika

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