काशी सत्संग: लालसा की परिणति

यह लघुकथा अपने आप में बड़ा संदेश समेटे हुए है। एक बार आंख ने पेड़ पर फल देखा, लालसा जगी। आंख तो फल तोड़ नहीं सकती, इसलिए पैर गए पेड़ के पास फल तोड़ने। अब पैर तो फल तोड़ नहीं सकते, इसलिए हाथों ने फल तोड़े और मुंह ने फल खाएं और वो फल पेट में गए।
अब देखिए जिसने देखा वो गया नहीं, जो गया उसने तोड़ा नहीं, जिसने तोड़ा उसने खाया नहीं, जिसने खाया उसने रखा नहीं, क्योंकि वह पेट में गया।
अब जब माली ने देखा, तो डंडे पड़े पीठ पर जिसकी कोई गलती नहीं थी। लेकिन जब डंडे पड़े पीठ पर तो आंसू आए आंख में, क्योंकि सबसे पहले फल देखा था आंख ने, अब यही है कर्म का सिद्धान्त। यदि मन निर्मल हो और लालसा से विरक्त हो, तो कष्ट की संभावना नगण्य हो जाती है, अन्यथा लालसा की परिणति कष्टकारी ही होती है। इसीलिए कहा गया है-

चेतसा सर्वकर्माणि
मयि सन्न्यस्य मत्पर:।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य
मच्चित: सततं भव ॥
(गीता प्रबोधनी 18=56)

चित्त से सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके मेरे परायण होकर तथा समता का आश्रय लेकर निरन्तर मुझ में चित्त वाला हो जा।

व्याख्या : साधक के लिए दो ही मुख्य कार्य हैं- संसार के सम्बन्ध का त्याग करना और भगवान के साथ सम्बन्ध जोड़ना। एकमात्र भगवान का चिन्तन करने से संसार से सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वतः समता आ जाती है। भगवान का निरन्तर चिन्तन तभी होगा, जब ‘मैं भगवान् का ही हूं’-इस प्रकार अहंता भगवान् में हो जाएगी। अहंता भगवान में लग जाने पर चित्त स्वतः-स्वाभाविक भगवान में लग जाता है। भगवान के साथ जीवमात्र का स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसार के साथ सम्बन्ध मानने से ही इस नित्य सम्बन्ध की विस्मृति हुई है। इस विस्मृति को मिटाने के लिए भगवान कहते हैं कि निरन्तर मुझमें चित्त वाला हो जा।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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