काशी सत्संग: पेन्सिल की कहानी

एक बालक अपनी दादी को एक पत्र लिखते हुए देख रहा था। अचानक उसने दादी से पूछा-“दादी, क्या आप मेरी शरारतों के बारे में लिख रही हैं ?” यह सुनकर उसकी दादी रुकीं और बोलीं, “बेटा, मैं लिख तो तुम्हारे बारे में ही रही हूं, लेकिन जो शब्द मैं यहां लिख रही हूं, उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण यह पेन्सिल है। मुझे पूरी आशा है कि तुम बड़े होकर ठीक इसी पेन्सिल की तरह बनोगे।”
यह सुनकर वह बालक थोड़ा चौंका और पेन्सिल की ओर ध्यान से देखने लगा, किंतु, उसे कोई विशेष बात नजर नहीं आई। उसने दादी से फिर कहा-“दादी, यह पेन्सिल तो बाकी सभी पेन्सिलों की तरह ही दिखाई दे रही है।” दादी मुस्कुराईं, “बेटा ! यह इस पर निर्भर करता है कि तुम चीजों को किस नजर से देखते हो। इसमें पांच ऐसे गुण हैं, जिन्हें यदि तुम अपना लो, तो तुम सदा इस संसार में शांतिपूर्वक रह सकते हो।”
पहला गुण : तुम्हारे भीतर महान से महान उपलब्धियां प्राप्त करने की योग्यता है, किंतु तुम्हें यह कभी भूलना नहीं चाहिए कि तुम्हें एक ऐसे हाथ की आवश्यकता है, जो निरन्तर तुम्हारा मार्गदर्शन करे। हमारे लिए वह हाथ ईश्वर क हाथ है, जो सदैव हमारा मार्गदर्शन करता रहता है।
दूसरा गुण : बेटा ! लिखते, लिखते, लिखते बीच में मुझे रुकना पड़ता है और फिर कटर से पेन्सिल की नोंक बनानी पड़ती है। इससे पेन्सिल को थोड़ा कष्ट तो होता है, पर उसके बाद वह यह काफी तेज हो जाती है और अच्छी चलती है। इसलिए बेटा तुम्हें भी अपने दुखों, अपमान और हार को धैर्य से सहन करना आना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से तुम एक बेहतर मनुष्य बन जाओगे।
तीसरा गुण : बेटा ! पेन्सिल हमेशा गलतियों को सुधारने के लिए रबर का प्रयोग करने की इजाजत देती है। इसका यह अर्थ है कि यदि हमसे कोई गलती हो गई है, तो उसे सुधारना कोई गलत बात नहीं है। बल्कि ऐसा करने से हमें न्यायपूर्वक अपने लक्ष्यों की ओर निर्बाध रूप से बढ़ने में मदद मिलती है।
चौथा गुण : बेटा ! एक पेन्सिल की कार्य प्रणाली में मुख्य भूमिका इसकी बाहरी लकड़ी की नहीं, अपितु इसके भीतर के ‘ग्रेफाइट’ की होती है। ग्रेफाइट या लेड की गुणवत्ता जितनी अच्छी होगी,लेख उतना ही सुन्दर होगा। इसलिए बेटा ! तुम्हारे भीतर क्या हो रहा है, कैसे विचार चल रहे हैं, इसके प्रति सदा सजग रहो।
अंतिम गुण : बेटा ! पेन्सिल सदा अपना निशान छोड़ देती है। ठीक इसी प्रकार तुम कुछ भी करते हो, तो तुम भी अपना निशान छोड़ देते हो।
अतः सदा ऐसे कर्म करो, जिन पर तुम्हें लज्जित न होना पड़े, अपितु तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का सिर गर्व से उठा रहे। अतः अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सजग रहो।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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