काशी सत्संग : स्वभाव पर वश

एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, ‘मैं बहुत जल्दी क्रोधित हो जाता हूं। कृपया मुझे इससे छुटकारा दिलाएं।’
गुरु ने कहा- ‘यह तो बहुत विचित्र बात है! मुझे क्रोधित होकर दिखाओ।’ शिष्य बोला, ‘अभी तो मैं यह नहीं कर सकता।’ ‘क्यों?’ गुरु बोले। शिष्य ने उत्तर दिया, ‘यह अचानक होता है।’
गुरु ने कहा, ‘ऐसा है तो यह तुम्हारी प्रकृति नहीं है। यदि यह तुम्हारे स्वभाव का अंग होता, तो तुम मुझे यह किसी भी समय दिखा सकते थे। तुम किसी ऐसी चीज को स्वयं पर हावी क्यों होने देते हो जो तुम्हारी है ही नहीं?’ इस वार्तालाप के बाद शिष्य को जब कभी क्रोध आने लगता, तो वह गुरु के शब्द याद करता। इस प्रकार उसने शांत और संयमित व्यवहार को अपना लिया। जिस प्रकार क्रोध पर नियंत्रण पाकर मनुष्य शांत हो जाता है, उसी प्रकार दुःख पर नियंत्रण उसे आनंदित कर देता है। दुख संसार की देन है, आनंद स्वयं का होना चाहिए। अगर हम आनंदित होना चाहते हैं, तो अकेले भी हो सकते हैं। दुखी होने के लिए तो दूसरो की जरूरत पड़ती है। किसी ने हमारा अपमान किया, कोई हमारे अनुकूल नहीं चलता, सब दुख दूसरो से जुड़े हुए होते हैं और आनंद का दूसरे से कोई संबंध है ही नहीं। आनंद अंतर में स्थित है। दुःख तो बाहर से आता है, और आनंद हमारे भीतर से आता है। अगर आनंद चाहिए, तो अपने भीतर ही डुबकी लगानी होगी।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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