काशी सत्संग: वृक्ष का परोपकार

बरगद हिंदू धर्म में पवित्र वृक्ष मना गया है। ऐसा ही एक बरगद का वृक्ष एक गांव में था, जिसकी पूजा गांव के स्त्री-पुरुष करते थे। समय बीतता गया और वृक्ष बढ़ता गया। बरगद का वृक्ष बहुत पुराना हो गया, तो उसकी डालियां सूखने लगीं और टूटकर बिखरने लगीं।
वृक्ष की बुरी हालत को लेकर गांव में पंच बैठे, तय हुआ कि वृक्ष को काट दिया जाए और लकड़ियों को घरेलू उपयोग में लाया जाए। पंच ने इस बात को सहमति दे दी।
अगले दिन सुबह गांव वाले बरगद के वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी लेकर पहुंचे। बरगद के पेड़ के नजदीक ही एक और पेड़ था, वह बरगद से बोला, ‘मान्यवर ! आपको क्रोध नहीं आ रहा है। ये मनुष्य कितने स्वार्थी हैं। जब आपकी आवश्यकता थी, तो ये सभी आपको पूजते थे। और जब आप बूढ़े हो गए हैं, तो ये आपका अंत कर रहे हैं।’
बरगद के वृक्ष ने कहा, ‘नहीं दोस्त! मैं प्रसन्न हूं कि मरने के बाद भी इनके काम आ सकूंगा। यह परोपकार है।’
मित्रों, परोपकार करना हमारे जीवन का पहला उद्देश्य होना चाहिए। पेड़ परोपकार के लिए फल और लकड़ियां देते हैं। नदी परोपकार के लिए जल देती है। यानी प्रकृति के पंच तत्व परोपकार करते हैं, इसीलिए मनुष्य को भी परोकार करना चाहिए।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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