काशी सत्संग: सत्संग क्यों!

“मेधावी पुरुषों विद्वानूहापोहविचक्षण:।
अधिकार्यात्मविद्याया मुक्त लक्षण लक्षित: ||”

अर्थात : जो बुद्धिमान हो, विद्वान हो और तर्क वितर्क में कुशल हो, ऐसे लक्षणों वाला पुरुष ही आत्मविद्या का अधिकारी होता है। यह ज्ञान मूढ़ों के लिए नहीं है। अन्य साधनाएं तो मूढ़ भी कर सकता है, किंतु वेदान्त की विधि केवल विचार की है। विचार करने के लिए जिज्ञासु का बुद्धिमान एवं विद्वान होना आवश्यक है, जिससे वह वेदान्त के गुण को समझ सके, साथ ही वह तर्क वितर्क में भी प्रवीण हो, जिससे वह सत्यासत्य का निर्णय ले सके। ऐसी योग्यता वाला जिज्ञासु ही ज्ञान का अधिकारी होता है। जिसमें सोच समझ नहीं है, वह क्रिया योग में जा सकता है। वेदांत की विधि उसके लिए नहीं है।

सत्संग लाभ प्रसंग
एक संत रोज अपने शिष्यों को गीता पढ़ाते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे, लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ पढ़ाते हैं, वह समझ में नहीं आता, मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। गुरु ने कहा- कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ। शिष्य चकित हुआ, आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा? लेकिन गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए वह टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर पड़ा। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई, परंतु टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं, कोई फायदा नहीं। गुरु बोले- फायदा है। टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है। गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह बार-बार सत्संग सुनने से ही कृपा शुरू हो जाती है। भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है, लेकिन तुम सत्संग का लाभ अपने जीवन मे जरूर महसूस करोगे और हमेशा गुरु की रहमत तुम पर बनी रहेगी।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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