काशी सत्संग: सत्संग क्यों!!

सत्संग में नियमित आने वाले एक आदमी ने जब एक बार सत्संग में यह सुना कि जिसने जैसे कर्म किए हैं, उसे अपने कर्मों के अनुसार वैसे ही फल भी भोगने पड़ेंगे। यह सुनकर उसे बहुत आश्चर्य हुआ अपनी आशंका का समाधान करने हेतु उसने सत्संग करने वाले संतजी से पूछा, “..अगर कर्मों का फल भोगना ही पड़ेगा, तो फिर सत्संग में आने का किया फायदा है..!
संतजी ने मुसकुरा कर उसे देखा और एक ईट की तरफ इशारा करके कहा कि तुम इस ईट को छत पर ले जाकर मेरे सिर पर फेंक दो। यह सुनकर वह आदमी बोला संतजी इससे तो आपको चोट लगेगी दर्द होगा । मैं यह नहीं कर सकता…।
संत ने कहा, “..अच्छा, फिर उसे उसी ईट के भार के बराबर का रुई का गट्ठर बांध कर दिया और कहा- अब इसे ले जाकर मेरे सिर पर फेंकने से भी क्या मुझे चोट लगेगी…?”
वह बोला नहीं..। संत ने कहा, “बेटा इसी तरह सत्संग में आने से इन्सान को अपने कर्मों का बोझ हल्का लगने लगता है और वह हर दुख-तकलीफ को परमात्मा की दया समझ कर बड़े प्यार से सह लेता है। सत्संग में आने से इन्सान का मन निर्मल होता है और वह मोह-माया के चक्कर में होने वाले पापों से भी बचता हुआ अपने सतगुरु की मौज में रहता है। फिर एक दिन अपने निज घर सतलोक पहुंच जाता है, जहां केवल सुख ही सुख है।

“परहित बस जिन्ह के मन माहीं।
तिन्ह कहुं जग दुर्लभ कछु नाहीं॥”

भावार्थ : जिनके मन में सदैव दूसरे का हित करने की अभिलाषा रहती है अथवा जो सदा दूसरों की सहायता करने में लगे रहते हैं, उनके लिए संपूर्ण जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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