काशी सत्संग: बातों-बातों में…

किसी गांव में एक अत्यंत बातूनी लड़का रहता था रेम्स। रेम्स जितना बातूनी था, उतना ही आलसी और कामचोर था। उसके बाप-दादा ने उसके लिए अपार धन-दौलत छोड़ी थी। इस कारण उसे कमाने की कोई चिंता न थी। लेकिन खर्च करने की आदत और मतलबी दोस्तों के कारण रेम्स की धन-दौलत समाप्त होने लगी। बुरे वक्त में दोस्तों ने साथ छोड़ दिया। अब रेम्स काम की तलाश में उधर-उधर भटकने लगा। एक दिन वह राजा के दरबार में पहुंच गया और राजा से कोई नौकरी देने की प्रार्थना की।
राजा ने कहा- तुम हमारे लिए क्या काम कर सकते हो?
रेम्स को यूं तो कुछ काम करना नहीं आता था, परंतु बातें बनाने और गप्पें हांकने में उस्ताद था। वह तुरंत हाजिर-जवाबी के साथ बोला- जो काम आपके किसी आदमी से न हो सके, वह काम रेम्स कर दे। आप आजमाएं तो हुजूर।
राजा को लगा कि यह आदमी बहुत होशियार है। यह आड़े वक्त में खूब काम आएगा। यह सोचकर राजा ने रेम्स को नौकरी पर रख लिया। रेम्स को अच्छे ओहदे पर रखा गया था और प्रतिदिन एक सोने का सिक्का देना तय किया गया। रेम्स बहुत खुश था। वह राजसी मेहमानखाने से अपना मनपसंद भोजन करने लगा और राजमहल में ही एक कमरे में रहने लगा। जब कभी रेम्स का मन होता, वह अन्य कर्मचारियों व पहरेदारों के काम की निगरानी कर आता। एक दो लोगों को आलसी कह कर डांट लगा आता, फिर अपने कमरे में आराम करने लगता। राजमहल में ढेरों कर्मचारी थे। इस कारण कौन काम कर रहा है और कौन मुफ्त में तनख्वाह ले रहा है, राजा को पता ही नहीं लग पाता था। रेम्स के दिन बहुत मजे में कट रहे थे।
एक दिन पड़ोसी राजा ने उस देश पर आक्रमण कर दिया। राजा की फौज पड़ोसी राजा का मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रही थी। एक दिन थे मंत्रियों से मंत्रणा करते हुए राजा को रेम्स की याद हो आई, जिसने कहा था कि जो काम कोई न कर सके वह काम रेम्स कर दे। राजा ने रेम्स को बुलवा भेजा। रेम्स तुरंत सभा में हाजिर हुआ।
राजा ने रेम्स को उसका वादा याद दिलाया और आज्ञा दी कि तुम्हें किसी प्रकार इस युद्ध को रोकना होगा।
रेम्स भीतर ही भीतर घबरा उठा। उसे समझ में नहीं आया कि वह राजा को किस प्रकार संतुष्ट करे? परंतु ऊपर से हंसता हुआ बोला- महाराज! मैं पड़ोसी राजा की सेना के छक्के छुड़ा दूंगा।| अपनी तलवार यूं घुमाऊंगा कि दुश्मनों की गरदन धड़ से अलग हो जाएगी।
राजा ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा- क्या तुम युद्ध की विद्या भी जानते हो? रेम्स पहले दर्जे का गप्पी तो था ही, तुरंत बात बनाते हुए बोला- अरे मैं बहुत कुछ जानता हूं, बस मुझे मौका मिलना चाहिए। अब आप देखिएगा कि मैं क्या करता हूं?
राजा ने आश्वस्त होते हुए कहा- तुम्हें जो मदद चाहिए ले लो और जल्दी ही अपना कमाल दिखाओ।
रेम्स वहां से जाकर अपने कमरे में बैठ कर सोच-विचार करने लगा। वह जानता था कि वह कुछ भी नहीं कर सकता था, वह सिर्फ बातें बनाना जानता था।
उसने चुपचाप अपना सामान बांधकर एक कोने में रख दिया और खजाना मंत्री से जाकर कहा- मुझे राजा ने जो कार्य सौंपा है, उसके लिए हजार मोहरें चाहिए।
खजाना मंत्री ने सहर्ष ही उसे हजार मोहरें दे दीं। रेम्स खुश था कि भविष्य के लिए उसका अच्छा इंतजाम हो गया। राजा के यहां मिलने वाली सारी मोहरें भी उसने जोड़ रखी थीं।
उसने मन ही मन राजमहल से भाग जाने की योजना बना डाली। तभी उसे खयाल आया कि यहां से दूर जाते-जाते तो एक-दो दिन लग जाएंगे। इतने समय में तो वह भूखा मर जाएगा।
रेम्स शाम के वक्त रसोई में पहुंचा, लेकिन भोजन का वक्त न होने के कारण वहां शाही रसोइए मौजूद नहीं थे। तभी एक रसोइए ने वहां प्रवेश किया। वह बोला- आपको किसी चीज की आवश्यकता हो तो बताइए।
रेम्स ने तुरंत बात बनाते हुए कहा- मुझे शाही काम से बाहर जाना है, अत: मैं रात्रि के भोजन के समय मौजूद नहीं रहूंगा। यदि कोई भोजन आप अभी तैयार कर सकें तो…। रसोइये ने भोजन तैयार करने के लिए आधा-पौन घंटे का वक्त मांगा, तो रेम्स ने दोपहर के भोजन में से जो कुछ बचा हो वही देने की गुजारिश की।
रसोइए ने उसे बची तीन रोटी और एक सब्जी दे दी। इसके पश्चात् मौका देखकर रेम्स ने मोहरें, अपने समान की गठरी ली और महल के पिछवाड़े से बाहर निकल गया।
रात्रि होने को थी। रेम्स को किसी ने जाते हुए नहीं देखा। वह तेज कदमों से चलते हुए जंगल में पहुंच गया। तब तक रात हो गई थी, सो उसने एक रोटी निकाल कर खा ली और वहीं पेड़ पर सो गया।
सुबह होते ही वह आगे के लिए चल दिया। चलते-चलते वह थक गया था, उसे प्यास भी लगी थी। रास्ते में उसने एक तालाब देखा तो प्यास बुझाकर तालाब किनारे पेड़ के नीचे सो गया। काफी देर बाद रेम्स की आंख खुली, तो उसे जोर की भूख लगी थी, पर केवल दो रोटियां थीं। रेम्स सोचने लगा कि यदि उसने दोनों रोटियां अभी खा लीं तो बाद में भूख लगने पर क्या खाएगा। यह सोचते-सोचते वह बुदबुदाने लगा एक खाऊं, दोनों को खाऊं, एक खाऊं, दोनों को खाऊं…। भाग्यवश उस पेड़ पर दो परियां रहती थीं। उन परियों ने बुदबुदाते हुए सुना तो वे डर गईं कि रेम्स उन दोनों को खाने की बात कर रहा है। दोनों परियां झट से रेम्स के सामने आ खड़ी हुईं और प्रार्थना करने लगीं कि वह उन दोनों को छोड़ दे, बदले में बड़ा इनाम ले ले। रेम्स को पहले तो कुछ समझ में नहीं आया। उसने उनकी बातों को ध्यान से सुना तो समझ गया और बोला- मैं तुम दोनों की जान बख्श दूंगा, बोलो बदले में क्या दोगी?
एक परी बोली- मैं तुम्हें यह चटाई दूंगी, इस पर बैठकर तुम जहां चाहो जा सकते हो और दूसरी परी बोली- यह अंगूठी पहन लो, इसे पहन कर तुम अदृश्य हो जाओगे। इसके बाद तुम हर ताकतवर चीज का मुकाबला आसानी से कर सकोगे।
रेम्स यह सुनकर खुश हो गया और दोनों चीजें ले लीं। इसके बाद वह चुपचाप भोजन करने बैठ गया, तभी उसने देखा कि डाकुओं ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। उसे कुछ न सूझा तुरंत परी की दी हुई अंगूठी पहल ली और अदृश्य रह कर डाकुओं पर वार करने लगा। डाकू घबराकर भाग गए।
रेम्स ने चटाई पर बैठ गया और लड़ाई के मैदान में पहुंचने का आदेश दिया। कुछ ही क्षणों में वह पड़ोसी राजा के साथ हो रही लड़ाई के मैदान में पहुंच गया। अदृश्य रह कर उसने पड़ोसी राजा के सैनिकों के हथियार छीन कर मार-काट शुरू कर दी। सैनिक अदृश्य ताकत को भूत समझ डरकर भागने लगे। पड़ोसी राजा ने अपने सैनिकों से युद्ध मैदान का वर्णन सुना, तो तुरंत लड़ाई समाप्त कर शांति का संदेश भेजा।
उधर, अगले दिन सुबह राजा ने अपने सेवकों को रेम्स को बुलाने भेजा ताकि लड़ाई की तैयारियों के बारे में जानकारी ली जा सके, लेकिन उसे महल से लापता जानकर क्रोधित हो उठा। और रेम्स को खोजकर दरबार में पेश करने की आज्ञा दी। तभी रेम्स पड़ोसी सेना के शांति दूत के साथ नेतृत्व करते हुए लौटा। यह देख राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ और शांति दूत के जाने के बाद रेम्स से पूछा- तुम कहां चले गए थे, रेम्स?
रेम्स ने तुरंत बात बनाते हुए कहा- आपके आदेशानुसार युद्ध समाप्त कराने गया था। मैंने कहा था न कि जो काम कोई न कर सके, सो रेम्स कर दे। अब बताइए क्या आज्ञा है? राजा ने उसकी पदवी और वेतन बढ़ा दिया। अब रेम्स को भविष्य में कमाने की चिंता से मुक्ति मिल गई थी। वह चैन से राजा के महल में रहने लगा। मित्रों, जुबान से निकली बात अगर दूसरों को सुखी और प्रसन्न करे, तो यह भी एक बड़ी कला है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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